सीने में दिल है दिल में दाग़ दाग़ में सोज़-ओ-साज़-ए-इश्क़
सीने में दिल है दिल में दाग़ दाग़ में सोज़-ओ-साज़-ए-इश्क़
बेदम शाह वारसी
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रोचक तथ्य
اس غزل کا مطلعِ اول سراج میر خاں سحرؔ بھوپالی کے بیاض بعنوان بیاضِ سحر کے صفحہ 76 پر ان کے نام سے بھی درج ہے، قابلِ توجہ امر یہ ہے کہ سحرؔ بھوپالی عمر میں بیدمؔ وارثی سے بیس برس بڑے تھے اور ان کی وفات بھی بیدمؔ سے تقریباً انیس برس پہلے ہو چکی تھی، مزید دلچسپ یہ کہ بیاضِ سحر 1937 میں طبع ہوئی، جبکہ مصحفِ بیدمؔ 1936 میں شائع ہو چکی تھی۔
सीने में दिल है दिल में दाग़ दाग़ में सोज़-ओ-साज़-ए-इश्क़
पर्दः-ब-पर्दः है निहाँ पर्दा-नशीं का राज़-ए-इश्क़
नाज़ कभी नियाज़ है और नियाज़ नाज़-ए-इश्क़
ख़त्म हुआ न हो कभी सिलसिलः-ए-दराज़-ए-इश्क़
इश्क़ अदा-नवाज़-ए-हुस्न हुस्न करिश्मः-साज़-ए-इश्क़
आज से क्या अज़ल से है हुस्न से साज़-बाज़-ए-इश्क़
अपनी ख़बर कहाँ उन्हें जिन पे खुला है राज़-ए-इश्क़
सारे शुऊ'र मिट गए जब हुआ इम्तियाज़-ए-इश्क़
होश-ओ-ख़िरद भी अल-फ़िराक़ो-बैनी-व-बैनका कहें
हज़रत-ए-दिल का ख़ैर से है सफ़र-ए-हिजाज़-ए-इश्क़
पीर-ए-मुग़ाँ के पा-ए-नाज़ और मिरा सर-ए-नियाज़
होती है मय-कदे में रोज़ अपनी यूँही नमाज़-ए-इश्क़
हसरत-ओ-यास-ओ-आरज़ू शौक़ का इक़्तिदा करें
कुश्तः-ए-ग़म की लाश पर धूम से हो नमाज़-ए-इश्क़
इश्क़ की ज़ात ही से है ख़ूबी-ए-हुस्न-ओ-शान-ए-हुस्न
हुस्न के दम-क़दम से है सारा ये सोज़-ओ-साज़-ए-इश्क़
ऐ दिल-ए-दर्दमंद फिर नालः हो कोई दिल-गुदाज़
सूनी पड़ी है बज़्म-ए-शौक़ छेड़ दे अपना साज़-ए-इश्क़
होश-ओ-ख़िरद अदू-ए-इश्क़ इश्क़ है दुश्मन-ए-ख़िरद
है न हुआ न हो कभी अक़्ल से साज़-बाज़-ए-इश्क़
'बेदम'-ए-ख़स्तः है कहाँ अस्ल में कोई और है
ज़मज़मः-संज बे-ख़ुदी नग़्मः-तराज़ साज़-ए-इश्क़
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