'इश्क़ में ज़िंदगी का मज़ा है यही 'आशिक़-ए-ज़ार पहलू बदलता रहे
'इश्क़ में ज़िंदगी का मज़ा है यही 'आशिक़-ए-ज़ार पहलू बदलता रहे
यूँही घड़ियाँ शब-ए-ग़म की कटती रहें याद आते रहो दिल बहलता रहे
ज़िंदगी है हमारी तुम्हारा करम तुम रहो मेहरबाँ तो नहीं कोई ग़म
हम से न बदलो तुम तुम से बदलें न हम रोज़ चाहे ज़माना बदलता रहे
तुम मिरे सामने आओ तो इस तर्ह तेरा पर्दा रहे मुझ को दीदार हो
आप बन-बन के चिलमन में बैठा करें हुस्न छन-छन के बाहर निकलता रहे
उन की आँखों से मस्ती बरसती रहे होश उड़ते रहें दौर चलता रहे
सारा मय-ख़ाना यूँही छलकता रहे रिंद पीते रहें शैख़ जलता रहे
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