Sufinama

काफ़ी- वाह फ़रीदा वाहु जिन लाए प्रेम कली

बाबा फ़रीद

काफ़ी- वाह फ़रीदा वाहु जिन लाए प्रेम कली

बाबा फ़रीद

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    वाह फ़रीदा वाहु जिन लाए प्रेम कली

    सुनत फरज़ तबाबिया रोजे रखन तीह

    जूसफ खूह वगायआ, खूबी जिस इकीह

    ढूंढे विच बाजार दे ना दस लए वीह

    इबराहीम खलील नूं आतश भट्ठ मलीह

    इसमाईल कुहायआ दे के सार दपीह

    साबर कीड़े घड्या, है सी वडा वलीह

    ज़करिया चीर्या दरखत विच कीता डली डली

    तखतहु सुट्या सुलेमान ढोवे पया मलीह

    सिर पर चादे काबियां तिस लज लीह

    हजरत दा दामाद सी चड़्हआ उठ मली

    उटहु सुटी बारे विच करदे ज़िकर जली

    लेखा तिनां भी देवणा, सिका जान कली

    बेड़ा डुब्बा नुह दा, नउ नेजे नीर चड़्ही

    मूसा नठा मौत ते, ढूंडे काय गली

    चारे कूंंडां ढूंढियां अगे मउत खली

    रोवे बीबी फातमा बेटे दोए नही

    मैं की फेड़्या रब्ब दा मेरी जोड़ी ख़ाक रली

    महजाभि मानी कुहायआ होसी वडा वली

    पीर पैकम्बर अउलीए, मरना तिन्नां भली

    बिने चेते किछ मिलै पहरा करन कली

    ऊठ कतारां वेदियां हज़रत पकड़ खली

    कुदरत के कुरबान हउ आगे होरि चली

    फ़रीदा इह वेहानी तिना सिर, साडी क्या चली

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