Sufinama

लखनऊ के शायर और अदीब

कुल: 54

18वीं सदी के बड़े शायरों में शामिल, मीर तक़ी 'मीर' के समकालीन।

रामायण, भगवत गीता, और दूसरे बहुत से मज़हबी व ग़ैर मज़हबी पाठों का छन्दोबद्ध व गयात्मक अनुवाद करने के लिए प्रसिद्ध

मुख़्तलिफ़ ख़ूबियों वाला एक अ’ज़ीम शायर

लखनऊ के मशहूर ताजिर

दाग़ देहलवी के समकालीन। अपनी ग़ज़ल ' सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता ' के लिए प्रसिद्ध हैं।

हाजी वारिस अ’ली शाह के मुरीद और लखनऊ के शाइ’र-ए- मश्शाक़

मुस्हफ़ी का एक मुम्ताज़ शागिर्द

लखनऊ का मा’रूफ़ ना’त-गो शाइ’र

स्वतंत्रता सेनानी और संविधान सभा के सदस्य। ' इंक़िलाब ज़िन्दाबाद ' का नारा दिया। कृष्ण भक्त , अपनी ग़ज़ल ' चुपके चुपके, रात दिन आँसू बहाना याद है ' के लिए प्रसिद्ध

दबिस्तान-ए-लखनऊ के मुम्ताज़ शाइ’र

लखनऊ के सबसे गर्म मिज़ाज शायर। मीर तक़ी मीर के समकालीन। मुसहफ़ी के साथ प्रतिद्वंदिता के लिए मशहूर ' रेख़्ती ' विधा की शायरी भी की और गद्द में रानी केतकी की कहानी लिखी।

19वीं सदी की उर्दू ग़ज़ल का रौशन सितारा।

उर्दू के पहले सबसे बड़े शायर जिन्हें ' ख़ुदा-ए-सुख़न, (शायरी का ख़ुदा) कहा जाता है.

हसरत मोहानी के उस्ताद-ए-मोहतरम

फ़िरंगी महल के आ’लिम-ए-दीन और ख़्वाजा अ’ज़ीज़ लखनवी के शागिर्द-ए-अ’ज़ीज़

लखनऊ के मा’रूफ़ अदीब, शाइ’र और मुसन्निफ़

शायर, ख़दंग-ए-नज़र, ज़माना कानपुर और अदीब जैसी पत्रिकाओं के संपादक

ख़्वाजा आतिश लखनवी के शागिर्द-ए-रशीद

“अफ़्साना आ’शिक़-ए-दिल-गीर उ’र्फ़ शीरीं फ़र्हाद बित्तस्वीर के मुसन्निफ़।

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