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अनीसुल-अर्वाह या’नी मल्फ़ूज़ात-ए- ख़्वाजा उसमान हारूनी

ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती

अनीसुल-अर्वाह या’नी मल्फ़ूज़ात-ए- ख़्वाजा उसमान हारूनी

ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती

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    अनीसुल-अर्वाह

    या’नी मल्फ़ूज़ात-ए-

    ख़्वाजा उसमान हारूनी

    की पांच मुंतख़ब मजालिस का हिन्दी तर्जुमा

    मज्लिस (7)

    मोमिन को तकलीफ़ देने के बारे में गुफ़्तुगू हुई तो आप ने ज़बान-ए-मुबारक से फ़रमाया कि अबू हुरैरा रज़ीअल्लाहु अन्हु ने रसूलुल्लाह सल्लललाहू अलैहि वसल्लम से रिवायत किया है कि जिस शख़्स ने मोमिन को सताया समझो कि उस ने मुझ को नाराज़ किया और जिस ने मुझे नाराज़ किया उस ने ख़ुदावंद ता’ला को नाराज़ किया। हर मोमिन के सीने में अस्सी पर्दे होते हैं और हर पर्दा पर फ़रिश्ता खड़ा होता है जो शख़्स किसी मोमिन को सताता है वह ऐसा ही है जैसा कि उस ने अस्सी फ़रिश्तों को नाराज़ किया।

    फिर नमाज़ के बारे में गुफ़्तुगू हुई तो आप ने फ़रमाया कि यह नमाज़ फ़रीज़ा-ए-नमाज़ के बाद अदा की जाती है और हमारे मशाइख़ ने इस नमाज़ को अदा किया है। पस जो शख़्स ज़ुहर की नमाज़ से पहले चार रकअत नमाज़ अदा करे और जो कुछ क़ुरआन से जानता हो पढ़े तो ख़ुदावंद ता'ला उसे बहिश्त की ख़ुशख़बरी देता है और उस के लिए उस वक़्त सत्तर हज़ार फ़रिश्ते हदये लेकर आते हैं और उस नमाज़ के अदा करने वाले के सर पर क़ुर्बान करते हैं और जब क़ब्र से उठता है तो सत्तर पोशाकें पहनाकर बहिश्त में ले जाते हैं और जो शख़्स उस नमाज़ को ज़ुहर की नमाज़ के बा’द अदा करे,उस में क़ुरआन मुक़र्रर नहीं तो ख़ुदावंद ता’ला हर रकअत के बदले उस की हज़ार हाजतें रवा करता है और हज़ार नेकी उस के लिए लिखी जाती है और एक साल की इबादत का सवाब उसे मिलता है। किताब-ए-मुजीब में मशाइख़-ए-तबक़ात लिखते हैं कि दाना आदमी उस वक़्त तक नमाज़ नहीं पढ़ता जब तक नमाज़ में पूरी हुज़ूरी हासिल ना हो , चुनांचे मैं ने अपने पीर ख़्वाजा हाजी के रिसाले में लिखा हुआ देखा है कि ख़्वाजा यूसुफ़ चिशती चाहते कि नमाज़ शुरू करें तो हज़ार दफ़अ’ तकबीर कह कर बैठ जाते। जब मुकम्मल हुज़ूरी हासिल हो जाती तब नमाज़ शुरू करते और जब इयाका नअबुदु वा-इयाका नस्तअईनु (हम तेरी ही इबादत करते हैं और तुझ ही से मदद तलब करते हैं)पर पहुंचते तो देर तक ठहरे रहते। उल-ग़र्ज़ उन से जब इस का सबब पूछा गया तो आप ने फ़रमाया कि जिस वक़्त मुकम्मल हुज़ूरी हासिल होती है फिर नमाज़ शुरू करता हूँ क्योंकि जिस नमाज़ में मुशाहिदा ना हो उस में क्या नेअ’मत हो सकती है।

    फिर फ़रमाया कि एक दफ़अ' ख़्वाजा जुनैद बग़्दादी और ख़्वाजा शिबली बग़दाद से बाहर निकले और नमाज़ का वक़्त क़रीब आन पहुंचा। दोनों बुज़ुर्ग ताज़ा वुज़ू करने में मशग़ूल हुए और वुज़ू करने के बाद नमाज़ अदा करने लगे। इतने में एक शख़्स लकड़ियों का गठ्ठ्र सर पर उठाए जा रहा था। जब उस ने उन को देखा तो फ़ौरन ईंधन का गठ्ठ्र नीचे रख कर वुज़ू में मशग़ूल हुआ। इन बुज़ुर्गों ने अक़्ल से मा’लूम कर लिया कि यह मर्द ख़ुदा-रसीदों में से है। सब ने उस को इमाम मुक़र्रर किया। जब नमाज़ शुरू की तो रुकूअ’ और सुजूद में देर तक रहा। नमाज़ से फ़ारिग़ हो कर उस से इस का सबब पूछा तो उस ने कहा कि देर इस वजह से करता था कि जब तक एक तस्बीह पढ़ कर लब्बैक अ’बदी (ए मेरे बंदे ! मैं हाज़िर हूँ) ना सुन लेता दूसरी तस्बीह ना करता*

    फिर फ़रमाया कि एक दफ़अ में ख़ाना का’बा की तरफ़ मुजाविरों के दरमयान कुछ अ’रसा गोशा-नशीं रहा। उन बुज़ुर्गों में एक बुज़ुर्ग था जिसे ख़्वाजा उमर तसफ़ी कहते थे। एक दिन वह बुज़ुर्ग इमामत कर रहे थे। फ़ौरन हालत अ’जीब हो गई। सर मुराक़बा में ले गए। कुछ देर के बाद जब सर उठाया तो आसमान की तरफ़ देखने लगे और अह्ल-ए-मज्लिस को फ़रमाया कि कि सर उपर उठाओ और देखो*

    जूंही यह फ़रमाया मैं ने देखा। फिर फ़रमाया कि क्या कहते हैं और क्या देखते हैं। मैं ने कहा कि मैं ने देखा कि पहले आसमान के फ़रिश्ते रहमत के थाल हाथ में लेकर खड़े हैं और होंटों में कुछ कह रहे हैं।उन्हों ने फ़रमाया जानते हो यह क्या कहते हैं।? मैं ने कहा यह कहते हैं कि शैख़-साहब की बंदगी हमारी बंदगी की निस्बत बेहतर मा’लूम होती है।

    जूंही मैं ने यह कहा उस ने सर उठाया और मुनाजात की कि ख़ुदावंद! जो कुछ तेरे बंदे सुनते हैं अह्ल-ए-मज्लिस भी उसे सुनें। फ़ौरन ग़ैबी फ़रिश्ते ने आवाज़ दी। अज़ीज़ो यह फ़रिश्ते जो लबों को हिला रहे हैं यह कहते हैं कि ख़ुदावंद! ख़्वाजा तफ़सी के मुजाहिदा और इल्म की इज़्ज़त के सदक़े में हमें बख़्श। उस के बा’द फ़रमाया कि यह ने’मत हर मर्तबे में हासिल है लेकिन मर्द वह है कि उस में कोशिश करे ता कि उस मर्तबे पर पहुंच जाए।

    फिर फ़रमाया, दरवेश! बग़दाद में एक बुज़ुर्ग था जो साहब-ए-कश्फ़-ओ-करामात था। उस को लोगों ने पूछा कि आप नमाज़ क्यों नहीं अदा करते। फ़रमाया कि इस में तुम्हें कुछ दख़ल नहीं लेकिन जब तक दोस्त का चेहरा नहीं देख लेता मैं नहीं बैठता।

    फिर फ़रमाया यही सबब है कि जो बा’ज़ मशाइख़ फ़रमाते हैं कि इल्म इल्म है जिस को आलिम जानते हैं और ज़ोह्द ज़ोहद है जिस को ज़ाहिद जानते हैं और यह भेद है जिस को अह्ल-ए-मा’ना के सिवा और कोई नहीं जानता।

    फिर फ़रमाया कि जो शख़्स अ’स्र की नमाज़ से पहले चार रकअत नमाज़ अदा करे, अबू दर्दा ने फ़रमाया है कि उस को हर रकअत के बदले बहिश्त में एक महल मिलता है और वह ऐसा है कि गोया उस ने सारी उम्र ख़ुदावंद ता’ला की इबादत में बसर की है। जो शख़्स मग़रिब और इशा के दरमयान चार रकअत नमाज़ अदा करे वह बहिश्त में जाता है और मुसीबतों से अमन में होता है और हर रकअत के बदले पैग़ंबरी का सवाब मिलता है। जो शख़्स इशा के बाद चार रकअत नमाज़ अदा करे, वह बग़ैर हिसाब के बहिश्त में जाएगा और यह नमाज़ सिवाए ख़ुदा के दोस्त के और कोई अदा नहीं करता।

    फिर फ़रमाया कि जो शख़्स नमाज़ ज़्यादा करता है वह हिसाब में बहुत ज़्यादा रहता है और जो बदी करता है नेकी ज़्यादा होती है।

    फिर फ़रमाया कि मोमिन को मुनाफ़िक़ और ला’नती के सिवा और कोई नहीं सताता। ज्योंही ख़्वाजा साहिब ने इन फ़वाइद को ख़त्म किया। ख़िल्क़त और दुआ-गो वापिस चले आए। अलहम्दु लिल्लाहि अ’ला ज़ालिका*

    मज्लिस

    (8)

    गाली देने का ज़िक्र हुआ तो आप ने ज़बान-ए-मुबारक से फ़रमाया कि जो शख़्स मोमिन को गाली देता है वह गोया अपनी माँ और लड़की के साथ ज़िना करता है और ऐसे है जैसे मूसा अलैहिस-सलाम की लड़ाई में फ़िरऔन की मदद करना।

    फिर फ़रमाया कि जो शख़्स मोमिन को गाली देता है उस की दुआ’ चंद रोज़ तक क़ुबूल नहीं होती और अगर बग़ैर तौबा किए मर जाए तो गुनहगार ठहरता है।

    और खाने का ज़िक्र आया। जब खाना आया तो आप ने फ़रमाया कि खाना दस्तर-ख़्वान में लाओ ता कि उस के ऊपर रख कर खाएं। गो रसूल-ए-ख़ुदा ने दस्तर-ख़्वान पर तआ’म नहीं खाया लेकिन दस्तर-ख़्वान पर रख कर खाने को मना’ भी नहीं फ़रमाया। अगर खा लें तो जायज़ है लेकिन आओ! सब मिल कर खाएं। और ऐसा करें जैसा कि मेरे भाई ईसा अलैहिस-सलाम ने किया है।

    फिर फ़रमाया कि हज़रत मूसा अलैहिस-सलाम के दस्तर-ख़्वान का रंग सुर्ख़ था जो आसमान से उतरता था और उस में सात रोटियाँ और पाँच सेर नमक होता था। पस जो शख़्स दस्तर-ख़्वान पर रोटी नमक के साथ खाए हर लुक़्मा के साथ सौ नेकी लिखते हैं और सौ दर्जे बहिश्त में ज़्यादा करते हैं और बहिश्त में मूसा अलैहिस-सलाम के हमराह होता है। जो शख़्स सुर्ख़ दस्तर-ख़्वान पर नमक के साथ रोटी खाता है उसे बहिश्त में एक शहर मिलता है और जब रोटी खाने से पहले फ़ारिग़ होता है तो ख़ुदावंद ताला उस के तमाम गुनाह बख़्श देता है।

    फिर फ़रमाया कि ख़्वाजा मौदूद हसन की ज़बानी सुना है कि जो शख़्स सुर्ख़ दस्तर-ख़्वान पर रोटी खाता है ख़ुदावंद ताला उसे नज़र-ए-रहमत से देखता है।

    फिर फ़रमाया कि शमसुल-आरिफ़ीन और यह नाम उन का रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के रौज़ा-ए-मुबारक से पड़ा, यह इस तरह पर हुआ कि जिस रोज़ वह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के रौज़ा-ए-मुबारक पर पहुंचा और सलाम किया तो आवाज़ आई (व-अलैका अस्सलाम या शम्ससल आरिफ़ीन) शम्ससुल आरिफ़ीन तुझ पर सलाम।

    फिर फ़रमाया कि यही मुआमला इमाम-ए-आज़म रज़ी अल्लाह अन्हु से पेश आया था। जब आप इब्तिदाई हालत में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के रौज़ा-ए- मुबारक पर पहुंचे और कहा कि मुर्सलों के सरदार! तुझ पर सलाम हो तो आवाज़ आई। अलैकस्सलाम या इमाम-अल-मुस्लिमीन ! मुस्लमानों के इमाम! तुझ पर सलाम हो।

    फिर फ़रमाया कि ख़्वाजा बायज़ीद बुस्तामी का ख़िताब सुलतानुल आरिफ़ीन आसमान से था चुनांचे एक रात आधी रात के वक़्त उठ कर मकान की छत पर कर खिल्क़त को सोया देखा और किसी शख़्स को जागते हुए ना पाया। ख़्वाजा साहिब के दिल में ख़्याल गुज़रा कि अफ़सोस! ऐसी बा-अ’ज़मत दरगाह में बेदार और मशग़ूल क्यों नहीं हैं। चाहा कि ख़ुदावंद ता’ला से सारी खिल्क़त के जागने और मशग़ूल होने की दुआ’ करें। फिर दिल में ख़्याल आया कि शफ़ाअ’त का मक़ाम सरवर-ए-कायनात सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का है। मुझे क्या मजाल है कि ऐसी दरख़्वास्त करूँ।

    जूंही दिल में ये ख़्याल पैदा हुआ ग़ैब से आवाज़ आई कि बायज़ीद! इस क़दर अदब जो तू ने मलहूज़ रखा मैं ने तेरा नाम खिल्क़त में सुलतानुल -आरिफ़ीन रखा।

    फिर फ़रमाया कि अहमद माशूक़ के साथ भी ऐसा ही हुआ था कि एक दफ़अ' आप जाड़े के मौसम में चले कि रात निस्फ़ शब के क़रीब जब बाहर निकले तो पानी में चले गए और दिल में ठान लिया कि जब तक मुझे ये मा’लूम ना हो जाए कि मैं कौन हूँ हरगिज़ पानी से बाहर ना निकलूँगा। आवाज़ आई कि तू वह शख़्स है जिस की शफ़ाअ’त से क़यामत के दिन बहुत से आदमी बख़्शे जाऐंगे।

    शैख़ अहमद ने कहा मैं ये बात पसंद करता लेकिन मुझे यह मा’लूम होना चाहीए कि मैं कौन हूँ। फिर आवाज़ सुनी कि मैं ने हुक्म किया है कि तमाम दरवेश और आरिफ़ मेरे आशिक़ हों और तू मेरा मा’शूक़ हो *

    फिर ख़्वाजा साहिब वहाँ से बाहर निकले। जो शख़्स आप को मिलता अस्सलामु अलैकुम अहमद मा’शूक़ कहता।

    फिर फ़रमाया कि शमसुल आरिफ़ीन नमाज़ अदा ना करते थे। जब लोगों ने आप से उस का सबब दरयाफ़्त किया तो आप ने फ़रमाया कि नमाज़ ब-ग़ैर सूरा-ए-फ़ातिहा के पढ़ता हूँ। लोगों ने कहा कि यह कैसी नमाज़ है। फिर लोगों ने इल्तिजा की तो आप ने फ़रमाया कि सूरा-ए- फ़ातिहा तो पढ़ता हूँ लेकिन इयाका नअ’बुदु वा-इयाका नस्तअई॒नु नहीं पढ़ता। लोगों ने अ’र्ज़ किया कि आप ज़रूर पढ़ें।

    उस के बाद देर तक गुफ़्तुगू होती रही। जब नमाज़ के लिए खड़े हुए और सूरा-ए- फ़ातिहा पढ़ना शुरू किया और जब इयाका नअ’बुदु इयाका नस्तअईनु पर पहुंचे तो आप के वजूद-ए-मुबारक के हर रौंगटे से ख़ून जारी हो गया।

    फिर हाज़िरीन की तरफ़ मुख़ातिब हो कर फ़रमाया कि मेरे लिए नमाज़ दुरुस्त नहीं गो लोग तो कहते हैं कि मैं नमाज़ अदा करता हूँ।

    जब ख़्वाजा साहिब इन फ़वाइद को ख़त्म कर चुके तो याद-ए-ख़ुदा में मशग़ूल हुए और खिल्क़त और दुआ’-गो वापिस चले आए। अलहम्दु लिल्लाहि-अ’ला ज़ालिका*

    मज्लिस

    (9)

    रोज़ी कमाने और काम करने के बारे में गुफ़्तुगू हुई तो आपने ज़बान-ए-मुबारक से फ़रमाया कि एक दफ़अ’ रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम बैठे हुए थे। एक शख़्स ने उठ कर पूछा, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम !मेरे पेशे के बारे में आप की क्या राय है ? आँहज़रत ने फ़रमाया कि तेरा पेशा क्या है? उस ने अ’र्ज़ किया कि दर्ज़ी का काम। आप ने फ़रमाया कि अगर तू रास्ती से यह काम करे तो बहुत अच्छा है। क़यामत के दिन तू इदरीस पैग़ंबर के हमराह बहिश्त में जाएगा।फिर एक और आदमी ने उठ कर अर्ज़ किया कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! मेरे पेशे की निस्बत आप की क्या राय है। आँहज़रत ने फ़रमाया कि तू क्या काम करता है ? उस ने अ’र्ज़ किया कि खेती बाड़ी।आँजनाब ने फ़रमाया कि यह बहुत अच्छा काम है। इस वास्ते कि यह काम इबराहीम अलैहिस-सलाम का था। यह मुबारक और फ़ाइदामंद काम है। ख़ुदावंद ता’ला इबराहीम अलैहिस-सलाम की दुआ’ से तुझे बरकत देगा और क़यामत के दिन बहिश्त में तू इब्रहीम अलैहिस-सलाम के नज़दीक होगा। फिर एक और आदमी ने उठ कर अर्ज़ किया कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम !आप की राय में मेरा पेशा कैसा है? आँहज़रत ने फ़रमाया कि तू क्या काम करता है? उस ने अ’र्ज़ किया कि मेरा काम ता’लीम है। आप ने फ़रमाया कि तेरे काम को ख़ुदावंद ता’ला बहुत ही अच्छा जानता है।अगर तू खिल्क़त को नसीहत करेगा तो क़यामत के दिन ख़िज़्र अलैहिस-सलाम का सा सवाब तुझे मिलेगा और अगर तू अद्ल करेगा तो आसमान के फ़रिश्ते तेरे लिए मुआफ़ी के ख़्वास्तगार होंगे। फिर एक और आदमी ने उठ कर अर्ज़ किया कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! मेरे पेशे की निस्बत आप क्या फ़रमाते हैं। आँहज़रत ने फ़रमाया कि तेरा पेशा क्या है ? उस ने अ’र्ज़ किया कि सौदागरी। आँहज़रत ने फ़रमाया कि अगर तू रास्ती से काम करेगा तो बहिश्त में पैग़ंबरों का हम-राही होगा।

    फिर फ़रमाया कि रोज़ी कमाने वाला ख़ुदा का दोस्त होता है लेकिन उसे चाहिए कि नमाज़ हर वक़्त अदा करे और शरीअ’त की हद से क़दम बाहर ना रखे क्योंकि हदीस में है कि ऐसा रोज़ी कमाने वाला ख़ुदा का प्यारा और ख़ुदा का सिद्दीक़ है।

    फिर फ़रमाया कि अबू दरदा रज़ी अल्लाहु अन्हु दुकानदारी किया करते थे। जब आख़िरी ज़माने में आप को मुसलमानी की हक़ीक़त मा’लूम हुई तो आप ने दुकानदारी तर्क कर दिया। लोगों ने कहा कि आप ने दुकान क्यों छोड़ दी? आप ने फ़रमाया कि जब मुझे मा’लूम हुआ कि दुकानदारी के हमराह मुसलमानी ठीक तौर पर नहीं रहती तो मैं ने दुकानदारी छोड़ दिया।फिर फ़रमाया कि रोज़ी कमाने वाला ख़ुदा का सिद्दीक़ होता है क्योंकि उस शख़्स को ख़ुदा पर भरोसा है और उस शख़्स पर रोज़ी कमाना कुफ़्र है बशर्ते कि जिस वक़्त नमाज़ का वक़्त क़रीब हो सब काम धंदे छोड़ कर नमाज़ अदा करे तो ऐसा रोज़ी कमाने वाला सिद्दीक़ है।

    जूंही ख़्वाजा साहिब ने इन फ़वाइद को ख़त्म किया खिल्क़त और दुआ-गो वापिस चले आए। अलहम्दु लिल्लाहि अ’ला ज़ालिका*

    मज्लिस

    (12)

    सलाम कहने के बारे में गुफ़्तुगू शुरू हुई तो आप ने ज़बान-ए-मुबारक से फ़रमाया कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से हदीस में आया है कि जब मज्लिस से उठे तो सलाम कहे क्योंकि सलाम कहना गुनाहों का कफ़्फ़ारा है,फ़रिश्ते उस के लिए बख़शिश के ख़्वास्तगार होते हैं। जो शख़्स मज्लिस से उठते वक़्त सलाम कहता है तो ख़ुदावंद ता’ला की रहमत उस पर नाज़िल होती है और उस की नेकियां और ज़िंदगी ज़्यादा होती है।

    फिर फ़रमाया कि मैं ने ख़्वाजा यूसुफ़ हसन चिशती की ज़बानी सुना है कि जब कोई शख़्स मज्लिस से उठता है और सलाम कहता है तो उसे हज़ार नेकियाँ मिलती हैं और उस की हज़ार हाजतें रवा होती हैं। वह गुनाहों से ऐसा पाक हो जाता है गोया कि माँ के शिकम से निकला है ।उस के एक साल के गुनाह बख़्शते हैं और एक साल की इबादत उस के आ’माल-नामे में दर्ज करते हैं और सौ हज और उमरा उस के नाम लिखते हैं और रहमत के सौ थाल उस बंदे के सर पर क़ुर्बान करते हैं।

    फिर फ़रमाया कि अमीरुल-मोमिनीन हज़रत अ’ली रज़ीयल्लाहु अन्हु ने फ़रमाया कि मैं ने चाहा कि कोई ऐसा मौक़ा मिले कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मज्लिस में तशरीफ़ लाने के वक़्त या तशरीफ़ ले जाने के वक़्त मैं सलाम कहूं लेकिन मौक़ा ना मिला। जब कभी मैं ने सलाम करना चाहा तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पहले ही सलाम कहते। कहते हैं कि सलाम करना नबियों की सुन्नत है ।तमाम पैग़मबर जो गुज़रे हैं वह सब से पहले सलाम कहा करते थे।

    जूंही ख़्वाजा साहिब ने इन फ़वाइद को ख़त्म किया आप याद-ए-इलाही में मशग़ूल हो गए और खिल्क़त और दुआ-गो वापिस चले आए। अलहम्दु लिल्लाहि अ’ला ज़ालिका**

    मज्लिस

    (25)

    दरवेशों के बारे में गुफ़्तुगू शुरू हुई। आप ने ज़बान-ए-मुबारक से फ़रमाया कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से हदीस में है कि जो शख़्स दरवेशों को खाना खिलाता है वह तमाम गुनाहों से पाक हो जाता है।

    फिर फ़रमाया कि तीन किस्म के लोग बहिश्त की तरफ़ नहीं आएँगे। एक झूट बोलने वाला दरवेश ,दूसरा बख़ील दौलत-मंद और तीसरा ख़ियानत करने वाला सौदागर। तीनों को सख़्त अ’ज़ाब होगा। पस जब दरवेश झूटा और दौलत-मंद बख़ील बन जाए और सौदा-गर ख़ियानत करने वाला हो जाए तो ख़ुदावंद ता’ला दुनिया से बरकत उठा लेता है।

    फिर फ़रमाया कि जो शख़्स दिन रात में हर नमाज़ के बा’द सूरा-ए-यासीन और आयतुल-कुर्सी एक दफ़अ’ और क़ुल हुवल्लाहु अहद तीन मर्तबा पढ़े तो ख़ुदावंद ता’ला उस के माल और उस की उम्र को ज़ियादा करता है और उस को क़यामत के मीज़ान और पुल-सरात के हिसाब में आसानी होती है।

    जूंही ख़्वाजा साहिब ने इन फ़वाइद को ख़त्म क्या, आप याद-ए-इलाही में मशग़ूल हो गए और खिल्क़त और दुआ-गो वापिस चले आए। अलहम्दु लिल्लाहि अ’ला ज़ालिका**

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