पिया था कैसा जाम-ए-बे-खु़दी अहमद 'अली बाबा
रोचक तथ्य
منقبت در شان حضرت احمد علی۔
पिया था कैसा जाम-ए-बे-खु़दी अहमद 'अली बाबा
तिरी मस्ती 'इबादत बन गई अहमद 'अली बाबा
जो ज़ाहिर में थी इक दीवानगी अहमद 'अली बाबा
हक़ीक़त में थी रम्ज़-ए-आगही अहमद 'अली बाबा
खुले थे राज़-ए-क़ुदरत साफ़ तेरे शीशा-ए-दिल पर
निगाहों में थी दुनिया ग़ैब की अहमद 'अली बाबा
उठा दी है नज़र जिस सम्त जोश-ए-कैफ़-ओ-मस्ती में
लुटा दी है शराब-ए-ज़िंदगी अहमद 'अली बाबा
तिरी मज्ज़ूबियत थी एक पर्दा अहल-ए-दुनिया से
छुपा रखी थी दुनिया कश्फ़ की अहमद 'अली बाबा
तिरे दर पे जो रोते आए वो हँसते हुए निकले
खिला दी तूने हर दिल की कली अहमद 'अली बाबा
हयात-ए-जाविदाँ क़दमों में तेरे सर झुकाती है
मिली मुर्दा दिलों को ज़िंदगी अहमद 'अली बाबा
तिरी ख़ाक-ए-लहद से अब भी दुनिया फ़ैज़ पाती है
तू अब तक भी है इक ज़िंदा वली अहमद 'अली बाबा
तिरे इक जज़्बा-ए-मस्ती पे क़ुर्बां ज़ाहिरी सज्दे
अदा की क्या नमाज़-ए-'आशिक़ी अहमद 'अली बाब
नज़र उस के सिवा कोई न आए तेरे 'आरिफ़ को
सिखा दे वो अदा-ए-बंदगी अहमद 'अली बाबा
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