कल हम जो गए बाग़ में टुक लुत्फ़ उठाने
रोचक तथ्य
خمسہ بر غزل سراپاؔ۔
कल हम जो गए बाग़ में टुक लुत्फ़ उठाने
और दिल को लगे सैर-ए-गुलिस्ताँ की दिखाने
इतने में कहूँ क्या तुझे ऐ यारे गाने
बर बूद दिलम दर चमने सर्व-ए-रवाने
ज़र्रीं कमरे सीम-बरे मूसा मियाने
वो शोख़ कि 'आलम में न देखा हो किसी ने
वो हुस्न कि ने हूर ने पाया न परी ने
क्या तुझ से कहूँ उस की मैं ख़ूबी के क़रीने
ख़ुर्शीद-रुख़े माह-वशे ज़ोहरः-जबीने
याक़ूत लिए संग-दिली तंग-दहाने
गुलफ़ाम गुल-अंदाम दिला-राम निकूए
दिल-दार दिल-आज़ार जफ़ा-कार दो-रूए
आहू-सिफ़ते कब्क-सगे 'अम्बरीं-मूए
बे-दाद-गरे कज-कुलहे 'अर्बदः-जूए
शकर-शिकने तीर-कदे सख़्त-कमाने
अब्रू-ए-ख़म-ए-ताक़-ए-हरम-ओ-ज़ुल्फ़-ए-कुनिश्ते
क़द रंज दिल-ए-तूबा-ओ-रुख़ रश्क-ए-बहिश्ते
तिल नक़्श-ए-सुवैदा-ए-दिल-ओ-ख़त लब-ए-कुश्ते
जादू-नज़रे 'इश्वः-गरे हुस्न-ए-सरिश्ते
आसेब-वले रंज-तने आफ़त-ए-जाने
दो-रुख़ कि हर इक शोख़-ए-पर्री-ज़ाद को शह दे
वो ज़ुल्फ़ कि सुम्बुल जिसे बेताब हो कह दे
गर हूर भी देखे तो उसे जान में रह दे
'ईसा-ए-नफ़से ख़िज़्र-ए-रहे यूसुफ़-ए-'अहदे
जम-मर्तबा ताजवरे शाह-जहाने
शमशीर-ए-निगह तीर-ए-मिज़ः क़ातिल-ए-ख़ल्क़े
ग़ारत-गर-ओ-बर्बाद दह-ए-हासिल-ए-ख़ल्क़े
मशहूर-ए-जहाँ फ़ित्नः-ए-जाँ मुक़्बिल-ए-ख़ल्क़े
तंग-ए-शकरे चूँ शकरे दर दिल-ए-ख़ल्क़े
शोख़े नमकीने चु नमक शोर-ए-जहाने
क्या उस की में तारीफ़ कहूँ हुस्न-ए-अदा की
है ख़त्म-ए-दो-'आलम की उसी शोख़ पे ख़ूबी
फिर मिस्ल-ए-'नज़ीर' उस बुत-ए-रा'ना से लगा जी
बे-ज़ुल्फ़-ओ-रुख़-ओ-ला'ल-ए-लब-ए-ऊ शुदः 'सा'दी'
आहे-ओ-बुख़ारे-ओ-ग़ुबारे-ओ-दुख़ाने
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