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ऐ क़मर तल’अत-ए-मक्की मतला'

जामी

ऐ क़मर तल’अत-ए-मक्की मतला'

जामी

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    क़मर तल'अत-ए-मक्की मतला'

    मदनी-ए-महद-ओ-यमानी बुर्क़ः

    वो जो मक्का के उफ़ुक़ से चाँद की तरह तुलू’ हुए، जो मदीना की गोद में रहने वाले यमन की चादर ओढ़ने वाले हैं।

    शुक़्क़ः-ए-बुर्क़ः-ए-तू बर्क़-अफ़रोज़

    लम'आ-ए-नूर-ए-रुख़त ख़िर्मन-सोज़

    बुर्क़े के नीचे से आपके चेहरा-ए-अनवर की चमक बिजली की तरह तेज़ है।

    आपके नूरानी चेहरे की एक झलक दिलों के पूरे ख़िरमन को जला देने वाली है। (यानी आपके मुकम्मल हुस्न पर एक हिजाब था، आपका बे-इंतिहा जमाल सब पर खुला हुआ नहीं था, फिर भी उस छुपे हुए पर्दे के बावुजूद

    लैलतुल-क़द्र ज़-मूयत तारे

    वह्इ-ए-मुनज़्ज़ल ज़-लबत गुफ़्तारे

    शब-ए-क़द्र आपकी काली ज़ुल्फ़ का एक तारा है

    (या सियाह ज़ुल्फ़ का सदक़ा है), और आपकी हर बात वही-ए-इलाही है।

    'आसियाँ बे-सर-ओ-सामान-ए-तु अन्द

    चश्म-ए-उमीद ब-दामान-ए-तु अन्द

    क़यामत के दिन गुनहगार बिल्कुल बे-सहारा होंगे, उनकी उम्मीद भरी निगाहें आपके दामन-ए-शिफ़ाअत से जुड़ी होंगी।

    ख़ास्सः 'जामी' कि कमीं बंद:-ए-तुस्त

    चश्म-ए-गिर्यां ब-शुक्र-ए-ख़ंदः-ए-तुस्त

    ख़ास तौर पर आपके निहायत ही हक़ीर ग़ुलाम जामी का हाल ये है

    कि वो आपके सामने रो रहा है और आप मुस्कुरा रहे हैं (इसमें ये मानी भी शामिल हैं कि जामी पर ये ख़ास इनायत हो कि जब वो आपके रू-ब-रू आए तो उसकी आँखों से आँसू बहें और आपके होंठों पर तबस्सुम हो)

    स्रोत :
    • पुस्तक : नग़मातुल उंस फ़ी मजालिसिल क़ुदस (पृष्ठ 332)
    • रचनाकार :शाह हिलाल अहमद क़ादरी
    • प्रकाशन : दारुल एशा'अत ख़ानक़ाह मुजीबिया (2016)
    • संस्करण : First

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