बाज़ याद आँ गुल-सिताँ आयद हमी
बाज़ याद आँ गुल-सिताँ आयद हमी
दिल चु बुलबुल दर फ़ुग़ाँ आयद हमी
फिर उस गुलिस्तान (मदीना तैय्यबा) की याद आ रही है। दिल बुलबुल की तरह रो रहा है और तड़प रहा है।
फ़र्रूख़ आँ रह कज़ नसीम-ए-जाँ-फ़िज़ा
बू-ए-यार-ए-मेहरबाँ आयद हमी
मुबारक है वो रास्ता (मदीना की गलियों का) जिसकी जीवन देने वाली हवा से प्यारे महबूब की खुशबू आ रही है।
बाज़ गो नग़्मः हुदी-ख़्वाँ बाज़ गो
ता-ब-मंज़िल कारवाँ आयद हमी
ऐ काफ़िले को ले जाने वाले! फिर से नग़्मा छेड़ो, ताकि मोहब्बत का काफ़िला अपनी मंज़िल तक पहुँच जाए।
ऐ ख़ुनुक चश्मे कि बा'द अज़ हस्रतश
मंज़िल-ए-जानाँ 'अयाँ आयद हमी
मुबारक है वो आँख, जिसमें तमन्नाओं के बाद
मंज़िल-ए-जाना साफ़ दिखाई दे रही है।
ज़ास्तानत दाश्त राहत-हा सरम
बाज़ सर बर आस्ताँ आयद हमी
आपके दर पर सर रखकर मुझे सुकून मिलता था
अब वही सर फिर से उसी चौखट पर आ रहा है।
बू-ए-ख़ुश अज़ कू-ए-ऊ अंदर मशाम
दर तन-ए-मुर्दः चु जाँ आयद हमी
उनकी गली की बेहतरीन ख़ुशबू मेरी साँसों में बस रही है
और बेजान तन में जान लौट रही है।
ऐ ख़ुशा वक़्ते मुबारक सा'अते
दोस्त पेश-ए-दोस्ताँ आयद हमी
क्या ही अच्छा और मुबारक वो समय होगा, जब महबूब अपने सच्चे आशिकों के सामने तजल्ली फ़रमाएगा (इस शेर में शायर का उद्देश्य रौज़ा-ए-अनवर की हाज़िरी और हबीब-ए-दो-आलम के दीदार को बयान करना है। देखने में ऐसा लगता है कि जब आशिक़ वहाँ जा रहे हैं तो उन्हें महबूब के सामने होना चाहिए, न कि महबूब उनके सामने आए। लेकिन इस अर्थ में एक कमी ये होती कि फिर महबूब पर हर किसी की नज़र पड़ती। यहाँ जो मतलब लिया गया है, उसमें महबूब का जल्वा सिर्फ़ सच्चे और ख़ास आशिक़ों के लिए है। और महबूब के ऊँचे दर्जे के लिहाज़ से यही अर्थ ज़्यादा उचित है।)
बुलबुल-ए-तु 'मुही-ओ-कूयत गुल-सिताँ
बुलबुल अंदर गुल-सिताँ आयद हमी
‘मुही’ तुम उनके दर के बुलबुल हो और उनकी गली तुम्हारे लिए गुलिस्तान है। अब ये बुलबुल अपने गुलिस्तान में लौट रही है।
- पुस्तक : नग़मातुल उंस फ़ी मजालिसिल क़ुदस (पृष्ठ 322)
- रचनाकार :शाह हिलाल अहमद क़ादरी
- प्रकाशन : दारुल एशा'अत ख़ानक़ाह मुजीबिया (2016)
- संस्करण : First
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