दर जुम्लः-जहाँ दीदम फ़ैज़ान-ए-मोहम्मद रा
दर जुम्लः-जहाँ दीदम फ़ैज़ान-ए-मोहम्मद रा
दीदेम ब-हर ज़र्रः सरयान-ए-मोहम्मद रा
मैंने मोहम्मद के कृपा को पूरी काइनात में फैला हुआ पाया। हर ज़र्रे में उनकी झलक देखी। (यानी काइनात का कोई भी ज़र्रा उनके वुजूद के असर से ख़ाली नहीं है। ये उस मशहूर रिवायत की ओर इशारा है जिसमें कहा गया है, सबसे पहले अल्लाह ने मेरा नूर पैदा किया। फिर सारी मख़्लूक़ मेरे नूर से पैदा की गई, और मैं अल्लाह के नूर से हूँ)।
दर किस्वत-ए-हर-ज़ाहिद दर ता'अत-ए-हर-'आबिद
दीदम ब-हम: यक-सर शायान-ए-मोहम्मद रा
हर ज़ाहिद के लिबास में और हर इबादत करने वाले की बंदगी में, मुझे हर जगह उनकी ही शान दिखाई दी।
दर दीदः-ए-हक़-बीनाँ अज़ दीदः-ए-हक-बीनाँ
हक़्क़ा कि हमः दीदम 'इरफ़ान-ए-मोहम्मद रा
हक़ को देखने वालों की आँखों में और उनकी नज़र से भी, सच तो ये है कि मुझे हर तरफ़ आपका ही ज्ञान और पहचान नज़र आया।
अज़ बादः-ए-तोहीदश मस्त अन्द हमः 'आलम
दीदम ब-हम: मोमिन ईमान-ए-मोहम्मद रा
आपकी तौहीद की शराब से पूरी दुनिया मस्त है। हर मोमिन के ईमान में मैंने मोहम्मद के ईमान का ही नज़ारा किया। (यानी अल्लाह की वहदत के अस्ली गवाह आप हैं, और दूसरों का ईमान आपकी गवाही पर आधारित है। इस तरह हर मोमिन का ईमान अस्ल में आप ही के ईमान से जुड़ा हुआ है।)
हम परतव-ए-नूर-ए-हक़ हम 'ऐन-ज़ुहूर-ए-हक़
हरगिज़ न-कसे याबद पायान-ए-मोहम्मद रा
हम हक़ के नूर की झलक हैं और उसी के प्रकट होने का माध्यम हैं, लेकिन मोहम्मद के कमाल और दर्जे की सीमा तक कोई भी नहीं पहुँच सकता।
ऐ 'नस्र' मन-ओ-अहमद यक-जानम-ओ-दो-क़ालिब
दीदम ब-हम: क़ालिब यक-जान-ए-मोहम्मद रा
ऐ ‘नस्र’! मैं और अहमद एक जान और दो शरीर जैसे हैं, और हर शरीर में वही एक जान, यानी मोहम्मद ही नज़र आते हैं। (ये बात इश्क़ और भक्ति की अवस्था में कही गई है, बराबरी का दावा नहीं है।)
- पुस्तक : नग़मातुल उंस फ़ी मजालिसुल क़ुदस (पृष्ठ 141)
- रचनाकार : शाह हेलाह अहमद क़ादरी
- प्रकाशन : दारुल एशा'अत ख़ानक़ाह मुजीबिया (2016)
- संस्करण : First
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