गर ब-गोयम ज़-नज़र-ए-दोस्त निहानस्त ग़लत
गर ब-गोयम ज़-नज़र-ए-दोस्त निहानस्त ग़लत
वर ब-गोयम कि बहर दीद: ’अयानस्त ग़लत
अगर कहूँ कि वो दोस्त की नज़र से ओझल है, तो ये ग़लत है,
और अगर कहूँ कि वो हर नज़र में साफ़ दिखाई देता है, तो ये भी ग़लत है।
शश-जिहत फ़ैज़ पज़ीर अज़ नज़र-ए-रहमत-ए-ऊस्त
वर ब-गोयम कि सू-ए-मा निगरानास्त ग़लत
हर दिशा उसकी नज़र-ए-रहमत से लाभान्वित है और अगर कहूँ कि वो सिर्फ़ हमारी ओर ही मुतवज्जेह है, तो ये भी ग़लत है।
मी-कशद ज़ारम-ओ-असलन गुनहे नीस्त मरा
वर ब-गोयम कि मरा दुश्मन-ए-जानस्त ग़लत
वो मुझ कमज़ोर को मार रहा है, जबकि मेरा कोई गुनाह नहीं,
अगर मैं कहूँ कि वो मेरा जानी दुश्मन है, तो ये भी ग़लत है।
जुज़ गुमाँ हेच न-दारम ब-कफ़ अज़ सिद्क़ ख़बर
वर ब-गोयम कि हमीं महज़ गुमानस्त ग़लत
अनुमान के सिवा मुझे सच्चाई का कोई पक्का ज्ञान नहीं,
और अगर ये कहूँ कि सब कुछ सिर्फ़ अनुमान ही है, तो ये भी ग़लत है।
'ख़ाक़ाँ' अज़ बे-ख़बरी ख़्वांद ग़लत न-शुमारी
गौहरश गर न-शिनासी ज़-चे कानस्त ग़लत
‘ख़ाक़ान’ ने अज्ञानवश उसकी क़द्र कम समझ ली, जब मोती को ही न पहचाना गया कि वो किस खान का है, तो समझ लो कि अस्ल भूल यही है।
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