हब्बज़ा 'अहदे कि मा बूदेम-ओ-ऐवान-ए-रसूल
हब्बज़ा 'अहदे कि मा बूदेम-ओ-ऐवान-ए-रसूल
ईं बुलंदी-हा-ए-बख़्तम ख़ुद ज़-फ़ैज़ान-ए-रसूल
कैसा मुबारक वो ज़माना था, जब हम थे और रसूल के दरबार की हाज़िरी थी। मेरी ये ऊँची क़िस्मत ख़ुद रसूलुल्लाह के फ़ैज़ और करम का नतीजा है।
के शुमुर्दन मी-तवाँ ख़ुद रा ज़-मेहमान-ए-रसूल
ईं बसस्त ऐ दिल शुदम अज़ 'अत्बः बोसान-ए-रसूल
मैं अपने आप को रसूल का मेहमान कैसे कह सकता हूँ? ऐ दिल, मेरे लिए यही बहुत है कि मैं रसूलुल्लाह की चौखट चूमने वालों में शामिल हो गया।
ऐ ख़ुशा फ़ीरोज़ी-ए-बख़्तम कि बूदम कामराँ
फ़ैज़याब अज़ जल्वः-ए-अनवार-ए-फ़ैज़ान-ए-रसूल
मेरी ख़ुश-क़िस्मती है कि मैं रसूलुल्लाह के नूर के फ़ैज़ से कामयाब और सरफ़राज़ हो गया।
हर-कुजा दर वादी-ए-बे-सायः गश्तम दर रहश
सर पनाहम बूद हर-जा ज़िल्ल-ए-दामान-ए-रसूल
उनकी गली की जिस बे-साया वादी में, मैं जहाँ भी रहा, हर जगह मुझे रसूलुल्लाह के दामन का साया महसूस होता रहा। (यानी मदीना तैय्यबा में हर हाल में नबवी रहमत और सरपरस्ती का एहसास बना रहा।)
तख़्त-ए-जम मुल्क-ए-सुलैमाँ गर्द-ए-ख़ाक-ए-कू-ए-हस्त
ता-शुदम 'मुही' गदा-ए-अज़ गदायान-ए-रसूल
जमशेद का तख़्त और सुलैमान की सल्तनत भी मेरी नज़र में उनकी गली की धूल के बराबर है, जब से मैं रसूलुल्लाह के गदाओं में एक गदा बन गया हूँ। (यहाँ जमशेद और सुलैमान की बादशाहत सिर्फ़ मिसाल के तौर पर है, मतलब ये है कि हर तरह की हुकूमत और बादशाही भी कू-ए-नबवी के सामने कोई अहमियत नहीं रखती।)
- पुस्तक : नग़मातुल उंस फ़ी मजालिसिल क़ुदस (पृष्ठ 234)
- रचनाकार :शाह हिलाल अहमद क़ादरी
- प्रकाशन : दारुल एशा'अत ख़ानक़ाह मुजीबिया (2016)
- संस्करण : First
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