हर लहज़ः जमाल-ए-ख़ुद नौ’-ए-दिगर आराई
शोर-ए-दिगर अंगेज़ी शौक़-ए-दिगर अफ़्ज़ाई
तू हर पल अपने हुस्न-ओ-जमाल को नए ढंग से सँवारता है अपने सौंदर्य से हर घड़ी नया हंगामा करता और आशिक़ों के दिलों में नई-नई चाहत और तड़प जगा देता है।
पिन्हानी-ए-तू पैदा पैदाई-ए-तू पिन्हाँ
हम अज़ हमः पिन्हानी हम बर हमः पैदाई
तेरा छुप जाना तेरी हस्ती का प्रकट होना है, और तेरे प्रकट होने में
तेरी हस्ती का छुप जाना है। तू सबसे ज़्यादा छुपा हुआ भी है और सब पर पूरी तरह प्रकट भी।
ज़ाँ सायः कि अफ़गनदी बर ख़ाक गहे जल्वा
दारंद हमः ख़ूबाँ सरमायः-ए-ज़ेबाई
जिस मिट्टी पर तेरी जल्वा-आराई से तेरा साया पड़ जाता है, उसी मिट्टी से दुनिया के सुंदर चेहरे अपनी शोभा और निखार पाते हैं।
ऐ गश्त: 'अयाँ हर जा हर जा कि शवद पैदा
गर्दद ज़-ग़मत शैदा सद ’आशिक़-ए-हरजाई
ऐ महबूब! जहाँ-जहाँ तू प्रकट हो जाता है, वहाँ सैकड़ों बे-क़रार आशिक़
तेरे इश्क़ में दीवाने हो जाते हैं।
'जामी' ज़-दुई ब-गुसिल यक रूई शवद यक दिल
बाशद कि कुनी मंज़िल दर 'आलम-ए-यकताई
जामी से कहा गया है दुई (द्वैत) को छोड़ दे, दिल और रुख़ दोनों को एक कर ले, शायद इसी तरह तू यक्ताई के मक़ाम तक पहुँच सके।
(इस ग़ज़ल के सभी अशआर का अस्ल संकेत परम सत्य, अर्थात् ईश्वर की ज़ात की ओर है। आख़िरी शे’र में जामी समझाते हैं कि ईश्वर तक पहुँचने के लिए ईश्वर के सिवा हर चीज़ से दिल का रिश्ता तोड़ना ज़रूरी है)
- पुस्तक : नग़मातुल उंस फ़ी मजालिसिल क़ुदस (पृष्ठ 301)
- रचनाकार :शाह हिलाल अहमद क़ादरी
- प्रकाशन : दारुल एशा'अत ख़ानक़ाह मुजीबिया (2016)
- संस्करण : First
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