ला-मकाँ बाशद मकानत या-'अली
ला-मकाँ बाशद मकानत या-'अली
के तवाँ जुस्तन निशानत या-'अली
ला-मकाँ ही आपका मकान है, ऐ अली! आपकी पहचान और पता कहाँ खोजा जाए ऐ अली!? (यहाँ ‘ला-मकाँ’ से आपकी महानता और बुलंदी मुराद है।)
बू-तुराबत ख़्वांद चूँ पैग़म्बरत
'अर्श-ए-ख़ाक-ए-आस्तानत या-'अली
पैग़म्बर ने आपको ‘अबू तुराब’ का ख़िताब दिया। अर्श भी आपके आस्ताने की ख़ाक है, ऐ अली! (अर्थात ‘अबू तुराब’ कहकर मिट्टी को इज़्ज़त मिली, और आपके दर की धूल भी सम्मानित हो गई।)
जान-ए-पाकत 'ऐन-ए-जान-ए-अहमद-अस्त
लहमुका-लहमीस्त शानत या-'अली
आपकी जान, अहमद की जान ही है, क्योंकि हज़रत ने आपकी शान में फ़रमाया: ‘लहमुका लहमी’ (यानी तुम्हारा गोश्त मेरा गोश्त है, मतलब ये कि मेरा जिस्म तुम्हारा जिस्म है)।
लिल-हुसैन इर्हम 'अलैना-वल-हसन
बंदः-ए-हस्तम अज़ानत या-'अली
हसन और हुसैन (अलैहिमस्सलाम) के सदके मुझ पर रहम कीजिए, मैं ख़ास आपका ही ग़ुलाम हूँ, ऐ अली।
शाह-ए-मर्दां क़िलः'-ए-ख़ैबर-शिकन
मिदहत-ए-ताब-ओ-तवानत या-'अली
‘शाह-ए-मर्दाँ’ और ‘क़िला-ए-ख़ैबर-शिकन’ जैसे ख़िताब दर-अस्ल आपकी ताक़त और बहादुरी की तारीफ़ हैं, ऐ अली।
'नस्र' रा अज़ गुफ़्तुगू ख़ामोश कर्द
लज़्ज़त-ए-सहर-ए-बयानत या-'अली
आपकी जादुई बयान की मिठास (फ़साहत और बलाग़त) ने ‘नस्र’ जैसे शाइर को भी ख़ामोश कर दिया, ऐ अली।
- पुस्तक : नग़मातुल उंस फ़ी मजालिसिल क़ुदस (पृष्ठ 316)
- रचनाकार :शाह हिलाल अहमद क़ादरी
- प्रकाशन : दारुल एशा'अत ख़ानक़ाह मुजीबिया (2016)
- संस्करण : First
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