ऐ ख़ाक-ए-दर गह-ए-तु जबीन-ए-नियाज़-ए-मा
ऐ ख़ाक-ए-दर गह-ए-तु जबीन-ए-नियाज़-ए-मा
क़ुर्बान-ए-यक-निगाह तु 'उम्र-ए-दराज़-ए-मा
ऐ वह ज़ात कि मेरी पेशानी-ए-नियाज़ आपके दर की ख़ाक है, आपकी एक नज़र पर हमारी पूरी तवील उम्र क़ुर्बान है।
मा के कुनेम रू ब-शिफ़ा-ख़ानः-ए-मसीह
ला'ल-ए-शकर-फ़रोश तु बस चारः-साज़-ए-मा
मैं मसीह के शिफ़ाख़ाने का रुख़ क्यों करूँ? आपके शीरीं होंठ ही मेरे तबीब हैं।
(“शिफ़ाख़ाना-ए-मसीह” से हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के उन मोज़िज़ात की तरफ़ इशारा है जिनमें वे मुर्दों को ज़िंदा और बीमारों को शिफ़ा देते थे। यहाँ शायर यह कह रहा है कि हमें हज़रत मसीह अलैहिस्सलाम की तरफ़ रजू करने की ज़रूरत नहीं रही; आँहज़रत ही हमारी चारागरी के लिए काफ़ी हैं—उनके लब-ए-मुबारक में शिफ़ा है, “ला'ल-ए-शकरफ़रोश” से होंठ मुराद हैं।)
बर कुंज-ए-ज़ुल्मतम गुज़र अज़ तल'अते गहे
ऐ आफ़ताब-ए-'आलम ज़र्रः-नवाज़-ए-मा
कभी मेरे दिल के तारीक गोशे को अपने हुस्न से रौशन कीजिए, आप ज़र्रे को नवाज़ने वाले हमारे आफ़ताब-ए-आलम-ताब हैं।
न-बुवद ब-ताक़-ए-का'बा सरोकार-ए-'इश्क़ रा
सर पेश-ए-अब्रू-ए-तु निहादन नमाज़-ए-मा
इश्क़ को त़ाक-ए-काबा (मिहराब-ए-हरम) से कोई सरोकार नहीं होता, आपके सामने सर रख देना ही मेरी नमाज़ है, (यानी मेरा इश्क़ महज़ ज़ाहिरी आमाल और रसूम का पाबंद नहीं, बल्कि हक़ीक़त में आपके आगे सर झुकाना—यानी दिल से आपकी मोहब्बत और इताअत—ही मेरी नमाज़ है। अस्ल नमाज़ वही है जिसमें ख़ुशूअ-ओ-ख़ुज़ूअ हो, और यह रसूल-ए-अकरम की इताअत और मोहब्बत के बग़ैर हासिल नहीं होती।)
- पुस्तक : नग़मातुल उंस फ़ी मजालिसुल क़ुदस (पृष्ठ 138)
- रचनाकार : शाह हेलाह अहमद क़ादरी
- प्रकाशन : दारुल एशा'अत ख़ानक़ाह मुजीबिया (2016)
- संस्करण : First
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