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शम'-ए-रूयत चराग़-ए-हर-ख़ानः

नस्र फुलवारवी

शम'-ए-रूयत चराग़-ए-हर-ख़ानः

नस्र फुलवारवी

MORE BYनस्र फुलवारवी

    शम'-ए-रूयत चराग़-ए-हर-ख़ानः

    हर दिल अज़ सोज़-ए-'इश्क़ परवानः

    आपके मुबारक चेहरे की शमा से (मुसलमान का) घर रौशन है।

    रौशन अज़ जल्वः-ए-जमाल-ए-तु शुद

    हर दर-ओ-बाम-ए-मा-ओ-काशानः

    आपके हुस्न के जल्वे से हर छत और दरवाज़ा, और हम सबके घर उजाले से भर गए हैं।

    अज़ जमाल-ए-तू का'बः शुद क़िब्ल:

    पेश अज़ीं वर्नः बूद बुत-ख़ानः

    आपके जमाल के फ़ैज़ से ही काबा क़िब्ला बना, वर्ना इससे पहले वो बुतों का घर था।

    क़दमे नेह कि ख़ानः ख़ानः-ए-तुस्त

    जल्वः-फ़रमाई बे-हिजाबानः

    तशरीफ़ लाइए, ये घर भी आपका ही घर है। बे-झिझक अपने जल्वे से इसे रौशन कर दीजिए।

    परी सायः-ए-ना-फ़िगंदः ब-सर

    बू-ए-ज़ुल्फ़-ए-तु कर्द दीवानः

    महबूब! मेरे सर पर किसी परी या साए का असर नहीं है, बल्कि आपकी ज़ुल्फ़ों की ख़ुशबू ने ही मुझे दीवाना बना रखा है। (यानी मेरी दीवानगी किसी जिन्न या परियों की वजह से नहीं, बल्कि आपकी ज़ुल्फ़ों की महक का असर है जो मेरे दिल-दिमाग़ में बस गया है)।

    'नस्र' चूँ शुद ग़ुलाम-ए-दर्गह-ए-तू

    ख़ुस्रवा यक निगाह-ए-शाहानः

    ‘नस्र’ जब आपके दर का ग़ुलाम बन गया, तो बादशाह! उस पर एक शाहाना निगाह डाल दीजिए।

    स्रोत :
    • पुस्तक : नग़मातुल उंस फ़ी मजालिसिल क़ुदस (पृष्ठ 289)
    • रचनाकार :शाह हिलाल अहमद क़ादरी
    • प्रकाशन : दारुल एशा'अत ख़ानक़ाह मुजीबिया (2016)
    • संस्करण : First

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