सिर्र-ए-असरार-ए-ईं दानम मन
सिर्र-ए-असरार-ए-ईं दानम मन
दर हिजाब-ए-ख़ुदी निहानम मन
मुझे सारे रहस्यों का ज्ञान है, लेकिन मुझ पर अपनी ‘ख़ुदी’ का पर्दा पड़ा हुआ है।
हम जहानेम-ओ-दर जहानम मन
बे-निशान-ओ-गहे निशानम मन
मैं दुनिया भी हूँ और दुनिया में भी हूँ, कभी मैं निशान-रहित हूँ और कभी पहचान वाला हूँ।
'इल्म-ए-ज़ात-ए-ख़ुदम ब-सिदक़-ओ-यक़ीं
गाहे-वहम-ओ-गहे गुमानम मन
मुझे अपनी हस्ती का पूरा एहसास है, फिर भी कभी भ्रम में पड़ जाता हूँ, कभी अंदाज़े में जीता हूँ।
वज़ कि पुर्सम हिकायत-ए-मन-ओ-तू
तू ज़बान-ए-हस्ती-ओ-बयानम मन
मैं किससे अपनी और तेरी कहानी पूछूँ? तू हस्ती की ज़बान भी है और मेरा बयान भी।
साजिद-ए-का'बः साकिन-ए-दैरम
शोर-ए-नाक़ूस-ओ-हम अज़ानम मन
मैं काबा में सज्दा करने वाला भी हूँ और मंदिर में ठहरने वाला भी,
मैं अज़ान भी हूँ और घंटियों की गूँज भी।
- पुस्तक : बज़्मे अबुल उला, भाग-002 (पृष्ठ 212)
- रचनाकार : अंजुम अकबराबादी
- प्रकाशन : वाबिस्तगान-ए-अबुल उलाइया, कराची (1989)
- संस्करण : First
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