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सूरत-ए-इंसान-ए-कामिल रा निशाँ मौला-ए-रूम

ग़ुलाम मोईनुद्दीन गिलानी

सूरत-ए-इंसान-ए-कामिल रा निशाँ मौला-ए-रूम

ग़ुलाम मोईनुद्दीन गिलानी

MORE BYग़ुलाम मोईनुद्दीन गिलानी

    रोचक तथ्य

    منقبت در شان حضرت مولانا جلال الدین رومی (قونیہ-ترکی)

    सूरत-ए-इंसान-ए-कामिल रा निशाँ मौला-ए-रूम

    सिर्र-ए-वहदत रा अतम शर्ह-ओ-बयाँ मौला-ए-रूम

    इंसान की बुलंदी और कमाल की सबसे बड़ी मिसाल मौलाना रूम हैं, एकत्व्वाद के राज़ को सबसे अच्छी तरह समझाने वाले भी मौलाना रूम हैं।

    आरज़ू दारम कि यक-बार-ए-दिगर दर क़ोनियः

    सर निहम बर आस्तान-ए-आसमाँ मौला-ए-रूम

    मेरी तमन्ना है कि एक बार फिर क़ोनिया जाकर, मौलाना रूम की दरगाह पर अपना सिर अदब से झुकाऊँ।

    लुत्फ़ फ़र्मा सू-ए-मन मन तालिब-ए-लुत्फ़-ए-तु-अम

    मुर्शिद-ए-मन हादी-ए-मन जान-ए-जाँ मौला-ए-रूम

    मुझ पर मेहरबानी की नज़र फ़रमाइए कि मैं आपका चाहने वाला हूँ, मेरे मुर्शिद, मेरे रहबर, मेरी जान की जान मौलाना रूम हैं।

    रोज़-ओ-शब मन दर ख़याल-ए-हज़रत-ए-वाला तु-अम

    ज़ाँ-कि अज़ यादत बुवद तस्कीन-ए-जाँ मौला-ए-रूम

    दिन-रात मेरा दिल आपके ऊँचे ख़यालों में डूबा रहता है, क्योंकि मौलाना! आपकी याद ही मेरी ज़िन्दगी का सुकून है।

    ज़िंदगी बर्बाद शुद 'उम्रम हमः कर्दम ख़राब

    रह्म फ़र्मा बर सर-ए-आवारगाँ मौला-ए-रूम

    मेरी ज़िंदगी बर्बाद हो गई और मैंने अपनी उम्र यूँ ही गँवा दी, मौलाना रूम! इस भटके हुए इंसान के हाल पर रहम कीजिये।

    नीस्त दर जान-ओ-दिलम जुज़ हुब्ब-ए-तु चीज़े दिगर

    बीनम अंदर जिस्म-ए-ख़ुद रूह-ए-रवाँ मौला-ए-रूम

    मेरे दिल और जान में आपकी मोहब्बत के सिवा कुछ नहीं, मुझे ऐसा लगता है जैसे मेरे जिस्म में मौलाना रूम की रूह बस गई हो।

    मन मरीज़-ए-दर्द-ए-'इस्यानम मरज़ शुद ला-'इलाज

    कुन 'इलाजम तबीब-ए-मेहरबाँ मौला-ए-रूम

    मैं गुनाहों के दर्द का मरीज़ हूँ और मेरा रोग अब लाइलाज हो चुका है, मेहरबान हकीम मौलाना रूम! मेरी मदद फ़रमाइए।

    मन ख़राब-ओ-ख़स्तः-अम अज़ ज़िंदगी बर-गश्त:-अम

    सूयत पनाह आवुर्दः-अम ख़्वाहम अमाँ मौला-ए-रूम

    मैं बेबस, थका हुआ दुनिया से उकता चुका हूँ, मौलाए रूम! मैं आपकी पनाह और अमान की तलाश में आपकी चौखट पर आया हूँ।

    मी-शवी फ़ारिग़ ज़ जुमलः रंज-ओ-ग़म-हा-ए-जहाँ

    गर कुनी 'मुश्ताक़' तू विर्द-ए-ज़बाँ मौला-ए-रूम

    तू दुनिया के ग़मों और हर तरह की मुसीबत से बेफ़िक्र हो जाएगा, मुश्ताक! अगर तू हर समय मौलाए रूम का नाम अपनी ज़बान पर रखे।

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    हाजी महबूब अ'ली

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