हक़ जल्वा-गर ज़-तर्ज़-ओ-बयान-ए-मोहम्मद अस्त
हक़ जल्वा-गर ज़-तर्ज़-ओ-बयान-ए-मोहम्मद अस्त
आरे कलाम-ए-हक़ ब-ज़बान-ए-मोहम्मद अस्त
हज़रत मोहम्मद के अंदाज़-ओ-बयान से सत्य प्रकट होता है।
अल्लाह का कलाम आपकी ही मुबारक ज़बान से लोगों तक पहुँचा।
आईनः-दार-ए-परतव-ए-मेहर अस्त आफ़्ताब
शान-ए-हक़ आशकार ज़-शान-ए-मोहम्मद अस्त
सूरज तो आपके सौंदर्य की आभा का दर्पण है।
अल्लाह की महानता भी हज़रत मोहम्मद की शान से प्रकट होती है।
तीर-ए-क़ज़ा हर आईनः दर तर्कश-ए-हक़ अस्त
अम्मा कुशाद-ए-आँ ज़-कमान-ए-मोहम्मद अस्त
तक़दीर का तीर बे-शक अल्लाह के तरकश में है,
लेकिन उसका चलना मोहम्मद के कमाम से जुड़ा है।
हर कस क़सम ब-आँ-चे 'अज़ीज़ अस्त मी-ख़ुरद
सौगंद-ए-किर्दगार ब-जान-ए-मोहम्मद अस्त
हर व्यक्ति अपने प्रियजनों की क़सम खाता है, लेकिन अल्लाह ने मोहम्मद की जान की क़सम खाई है। (क़ुरआन में ‘ल’उर्का’ यानी आपकी ज़िंदगी की क़सम। कह कर अल्लाह ने उनकी महानता प्रकट की है।)
वा'इज़ हदीस-ए-सायः-ए-तूबा फ़िराे गुज़ाश्त
कीं जा सुख़न ज़-सर्व-ए-रवान-ए-मोहम्मद अस्त
वाइज़ ने भी तूबा के साए की बात छोड़ दी, क्योंकि यहाँ मोहम्मद के सर्व जैसे ऊँचे और सुंदर क़द का ज़िक्र है, जिसके सामने तूबा की सुंदरता भी तुच्छ प्रतीत होती है।
'ग़ालिब' सना-ए-ख़्वाजः ब-यज़्दाँ गुज़ाश्तम
काँ ज़ात-ए-पाक मर्तबः-ए-दान-ए-मोहम्मद अस्त
ग़ालिब! मैंने दुनिया के सरदार हज़रत मोहम्मद की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह पर छोड़ दिया, क्योंकि मैं उनकी तारीफ़ का हक़ अदा करने में असमर्थ हूँ। वही पवित्र ज़ात मोहम्मद के अस्ली दर्जे को भली-भाँति जानती है।
- पुस्तक : नग़मातुल उंस फ़ी मजालिसुल क़ुदस (पृष्ठ 169)
- रचनाकार : शाह हेलाह अहमद क़ादरी
- प्रकाशन : दारुल एशा'अत ख़ानक़ाह मुजीबिया (2016)
- संस्करण : First
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.