ज़-ख़्वेश रफ़्तम चुनाँकि गोयम अना मोहम्मद अना मोहम्मद
ज़-ख़्वेश रफ़्तम चुनाँकि गोयम अना मोहम्मद अना मोहम्मद
चु लौह-ए-दिल अज़ दुई ब-शोयम अना मोहम्मद अना मोहम्मद
मैं (उनकी हस्ती में फ़ना होकर) अपने आप से इस तरह आगे बढ़ चुका हूँ कि कहता हूँ, ‘मैं मاहम्मद हूँ, मैं मोहम्मद हूँ।’ जब मैं अपने दिल से द्वैत और अलगाव का निशान मिटा देता हूँ, तब कहता हूँ, ‘मैं मोहम्मद हूँ, मैं मोहम्मद हूँ।’
ज़-नूर-ए-ऊ शुद वुजूद-ओ-बूदम ज़ुहूर-ए-ऊ शुद हमः नमूदम
सज़द कि गोयद चु जुम्लः ऊयम अना मोहम्मद अना मोहम्मद
उन्हीं के नूर से मेरा अस्तित्व है, उन्हीं का (आध्यात्मिक) प्रकट रूप मेरा संपूर्ण स्वरूप है। इसलिए ये कहने का मानो अधिकार बनता है कि जब मेरी पहचान पूरी तरह उन्हीं से जुड़ गई, तो ‘मैं मोहम्मद हूँ, मैं मोहम्मद हूँ।’
ज़-बातिन-ए-मन निदा बर आमद ब-तालिबान-ए-रसूल बर गो
बिया ब-सूयम बिया ब-सूयम अना मोहम्मद अना मोहम्मद
मेरे भीतर से ये आवाज़ आई कि रसूल के चाहने वालों से कह दो कि वे मेरी ओर आएँ। मैं मोहम्मद हूँ, मैं मोहम्मद हूँ।
जमाल-ए-पाक-ए-हसन ब-मन बीं जलाल-ए-रू-ए-'अली निगह कुन
दरूद बर-ख़्वाँ तु रू-ब-रूयम अना मोहम्मद अना मोहम्मद
पवित्र हसन का सच्चा सौंदर्य मुझमें देखो, अली का रो’ब और जलाल मुझमें देखो, मेरे सामने दुरूद पढ़ो। मैं मोहम्मद हूँ, मैं मोहम्मद हूँ।
चु 'नस्र' दर ख़ुद नज़र नमूदम हमः-जमाल-ए-रुख़श नमूदम
चु ख़ू-ए-ऊ गश्त जुम्लः-ख़ूयम अना मोहम्मद अना मोहम्मद
’नस्र’! जब मैंने अपनी हस्ती पर गहराई से नज़र डाली, तो उसमें उनके चेहरे की सुंदरता का प्रकाश पाया। जब मैं उनकी सीरत और आदतों में पूरी तरह ढल गया, तब ‘मैं मोहम्मद हूँ, मैं मोहम्मद हूँ।’
- पुस्तक : नग़मातुल उंस फ़ी मजालिसिल क़ुदस (पृष्ठ 209)
- रचनाकार :शाह हिलाल अहमद क़ादरी
- प्रकाशन : दारुल एशा'अत ख़ानक़ाह मुजीबिया (2016)
- संस्करण : First
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