ज़-नोश-ए-ला'ल-ए-तू ख़्वाहम दवा-ए-मन बाशद
ज़-नोश-ए-ला'ल-ए-तू ख़्वाहम दवा-ए-मन बाशद
हरीम-ए-कू-ए-तु दारुश्शिफ़ा-ए-मन बाशद
मैं चाहता हूँ कि मुझे आपके होंठों से ही दवा मिले। (यानी आपका मुझसे बात कर लेना ही मेरे लिए इलाज बन जाए)। आपकी पवित्र गली मेरे लिए दारुश्शिफ़ा बन जाए।
मरा गुनाह-ए-तुरा बहर-ए-रहमतस्त ब-जोश
ख़ुशा गुनाह कि रहमत जज़ा-ए-मन बाशद
मेरे गुनाहों के मुक़ाबिल आपकी रहमत जोश में है। कैसा अच्छा गुनाह है
कि मेरा बदला रहमत बन जाए।
पनाह-जू ब-दरत आमदम ब-’इज्ज़-ओ-नियाज़
कि आस्तान-ए-तु हाजत-रवा-ए-मन बाशद
मैं आपके दर पर आजिज़ी और विनती के साथ पनाह ढूँढता हुआ आया हूँ,
ताकि आपका आस्ताना मेरे लिए हर ज़रूरत पूरी करने वाला बन जाए।
म-कुन ब-नाज़-ए-तबीबाँ नियाज़-मंद मरा
कि ख़ाक-ए-पा-ए-तु ख़ाक-ए-शिफ़ा-ए-मन बाशद
मुझे हकीमों और वैद्यों के नाज़ का मोहताज़ न बनाओ,
क्योंकि आपके पाँवों की ख़ाक ही मेरे लिए ख़ाक-ए-शिफ़ा है।
इमाम-ए-बंद:-ए-मिस्कीं कमीनः-ए-दरगह-ए-तुस्त
बुवद कि गोशः-ए-चश्मे बरा-ए-मन बाशद
यह ग़रीब और बेबस बंदा, इमाम, आपके दर का एक अदना-सा ग़ुलाम है,
काश, आपकी एक नज़र मेरी तरफ़ भी पड़ जाए।
- पुस्तक : नग़मातुल उंस फ़ी मजालिसिल क़ुदस (पृष्ठ 189)
- रचनाकार :शाह हिलाल अहमद क़ादरी
- प्रकाशन : दारुल एशा'अत ख़ानक़ाह मुजीबिया (2016)
- संस्करण : First
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