Sufinama

राग बसंत- खेलत सतगुरू ऋतु बसंत । मुक्ति पदारथ मिले कंत ।।

कबीर

राग बसंत- खेलत सतगुरू ऋतु बसंत । मुक्ति पदारथ मिले कंत ।।

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    खेलत सतगुरू ऋतु बसंत । मुक्ति पदारथ मिले कंत

    खेलत सतगुरू ऋतु बसंत मुक्ति पदारथ मिले कंत ।।

    खेलत सतगुरू ऋतु बसंत मुक्ति पदारथ मिले कंत ।।

    धरती रथ चढ़ि देखो देस घर घर निरखो निरप नरेस ।।1।।

    जोजन चार पैतरे फेर बाँधि मवासी गढ़ मेँ घेर ।।2।।

    अधर निअच्छर गहो ढाल भागि चलै जब धरौ काल ।।3।।

    सर सुधारि घट कर कमान चंद चिला गाँह मारो बान ।।4।।

    साधू संग करो जोर तब घट छोड़ै चतुर चोर ।।5।।

    ऐसी बिधि से लड़ै सूर काल मवासी होय दूर ।।6।।

    अधर निअच्छर गहो डोर जो निज मानो बचन मोर ।।7।।

    धरती तुरँग होय असवार कहै कबीर भव उतरो पार ।।8।।

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