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हुसैन तुम को शहादत सलाम कहती है

सय्यद फ़ैज़ान वारसी

हुसैन तुम को शहादत सलाम कहती है

सय्यद फ़ैज़ान वारसी

MORE BYसय्यद फ़ैज़ान वारसी

    हुसैन तुम को शहादत सलाम कहती है

    शहादतों की हक़ीक़त सलाम कहती है

    तुम्हें तजल्ली-ए-वहदत सलाम कहती है

    तुम्हारे रब की जलालत सलाम कहती है

    वक़ार-ए-किब्रिया तुम पर सलात भेजे है

    तुम्हें तो शान-ए-रिसालत सलाम कहती है

    सलाम कहते हैं तुम्ही को अंबिया सारे

    हबीब-ए-रब की मोहब्बत सलाम कहती है

    ख़लील-ए-रब का ज़बीह-ए-ख़ुदा का कहना है

    तमाम नबियों की हिम्मत सलाम कहती है

    'अली-ए-जली की इमामत दुरूद भेजे है

    बतूल-ए-'अज़रा की ’इफ़्फ़त सलाम कहती है

    उन्ही के नूर-ए-नज़र और दिल की राहत हो

    'अली-ओ-ज़हरा की फ़रहत सलाम कहती है

    हसन का ख़ु्ल्क़-ओ-उख़ुव्वत सलाम कहता है

    नबी की हुस्न-ए-रफ़ाक़त सलाम कहती है

    करीम-ए-बैत-ए-नबी हैं मिरे हसन मौला

    तुम्हें हसन की करामत सलाम कहती है

    जनाब-ए-'आबिद-ए-बीमार से यूँ मेहदी तक

    तमाम नूर की जल्वत सलाम कहती है

    तुझे सलाम इमाम-ए-ज़मान कहते हैं

    और उन के पर्दे से ग़ैबत सलाम कहती है

    सलाम तुम्ही को हाशिम का चाँद कहता है

    और उस की रो'ब-ओ-जलालत सलाम कहती है

    सलाम-ए-सिद्क़-ए-बक्र और फ़ारूक़-ए-रब का

    तुम्हें ग़नी की 'इनायत सलाम कहती है

    तुम्ही जनाब-ए-नबी और 'अली के नाइब हो

    तुम्ही को इन की नियाबत सलाम कहती है

    जनाब-ए-ग़ौस-ए-मु’ईं और क़ुतुब-ए-दीं बाबा

    निज़ाम-ए-दीं की विलायत सलाम कहती है

    ये जो नजीब हैं 'उर्फ़ा तो तेरे दम से हैं

    हर इक वली की नजाबत सलाम कहती है

    तुझे मिला है ख़ुदा से जलाल-ओ-रो'ब ऐसा

    तमाम वलियों की हैबत सलाम कहती है

    दुरूद पढ़ती है हर शाख़ बाग़-ए-'इत्रत की

    तुम्हें नबी की क़राबत सलाम कहती है

    तुम्ही से बाग़-ए-नुबुव्वत को लाला-ज़ारी है

    तुम्हें गुलों की नज़ाकत सलाम कहती है

    तमाम गुलशन-ए-सादात तुम पे नाज़ाँ हैं

    जहान भर से सियादत सलाम कहती है

    क़रार-ए-गुंबद-ए-ख़ज़्रा सलाम कहता है

    हरम से का'बा की हुरमत सलाम कहती है

    तुम्हें वक़ार-ए-मदीना दुरूद भेजे है

    नबी की जा-ए-सुकूनत सलाम कहती है

    मदीना-पाक की मिट्टी दर-ए-नजफ़ की ज़ौ

    ये रेग-ज़ार की तल'अत सलाम कहती है

    क़ुरआन-ए-पाक ने मुझ पर ये राज़ खोला है

    कलाम-ए-हक़ की हर आयत सलाम कहती है

    नबी का ’अक्स-ए-हसीं हो हुसैन सीरत में

    नबी की सीरत-ओ-सुन्नत सलाम कहती है

    चराग़-ए-मस्जिद-ओ-मिम्बर दुरूद पढ़ते हीं

    ये ख़ानक़ाहों की निस्बत सलाम कहती है

    अज़ान शुक्रिया कहती तुम्हारे अकबर को

    सिपास कह के इक़ामत सलाम कहती है

    हुसैन बख़्शी है तुम ने नमाज़ को शोहरत

    तुम्हें नमाज़ की 'अज़्मत सलाम कहती है

    तुम्हारे 'अज़्म का रब्ब-ए-जली सना-गो है

    तुम्हें को जल्ल-ए-जलालत सलाम कहती है

    तुम्हारे नूर से मेरा वुजूद रौशन है

    पुकार के यही जन्नत सलाम कहती है

    तुम्ही हो जिस ने शहादत का पास रखा है

    शहीद तुम को शहादत सलाम कहती है

    ज़हे नसीब कि रब आप का यूँ राज़ी हुआ

    कि तुम को रब की रज़ायत सलाम कहती है

    हुसैन ख़ाना-ए-ज़ुल्मत में इक चराग़ ऐसा

    सिराज-ए-नूर की बरकत सलाम कहती है

    ये माह-ओ-अंजुम-ओ-नय्यर तुम्ही पे शैदा हैं

    तुम्हें ख़ुदा की ये ख़िल्क़त सलाम कहती है

    सलाम शजरा-ए-तूबा का नूर कहता है

    तमाम रौनक़-ए-जन्नत सलाम कहती है

    की यज़ीद की बै'अत और आबरू रख ली

    तुम्हें तो 'अज़्मत-ए-बै'अत सलाम कहती है

    तिरे वुजूद से आबाद कर्बला मौला

    उसी की क़िस्मत-ओ-’इज़्ज़त सलाम कहती है

    तुम्ही से पाया है क़ुर्बानी ने बुलंदी को

    उसी बुलंदी की रिफ़'अत सलाम कहती है

    तुम्हारे ख़ून से दीन-ए-नबी को रौनक़'' है

    नबी के दीन की शोहरत सलाम कहती है

    सलाम तुम पे हादी-ओ-रहनुमा मेरे

    तुम्हें सरापा हिदायत सलाम कहती है

    तुम्हें तो वारिस-ए-दस्तार-ए-नबी हो ऐसे

    नबी की इर्स-ओ-विरासत सलाम कहती है

    तुम्हें तिलावत-ओ-सज्दा सलाम कहता है

    ख़ुदा की सारी 'इबादत सलाम कहती है

    पढ़ा क़ुरआन को नेज़े की नोक पर तुम ने

    तुम्हें क़ुरआन की क़िरअत सलाम कहती है

    निकाल हुर को जहन्नम से दे दिया जन्नत

    'अता-ए-क़द्र पे क़ुदरत सलाम कहती है

    हुसैन तुम को नबी से है शर्फ़-ए-मिन्नी जो

    तुम्हें रसूल की क़ुर्बत सलाम कहती है

    बिना-ए-दीन बची कलिमा-ए-ला-इलाहा बचा

    तुम्हें तो कलिमा की हशमत सलाम कहती है

    लुटा दिया तू ने घर को ख़ुदा की मर्ज़ी पर

    निसार हो के सख़ावत सलाम कहती है

    दिया है तुम ने दिलेरी को एक रंग-ए-नौ

    सिपास कह के शहामत सलाम कहती है

    तिरा मक़ाम-ए-शहादत नबी को पहुँचे है

    नबी की शान-ए-शहादत सलाम कहती है

    तिरा तो वस्फ़ रक़म कर सके फ़क़त क़ुरआँ

    हर इक कलीम की हैरत सलाम कहती है

    नसब तुम्हारा जहाँ में शरीफ़-तर है जो

    हर इक नसब की शराफ़त सलाम कहती है

    तुम्हारे वस्फ़ में है आयत-ए-तहारत भी

    तुम्हें तहारत-ओ-’इस्मत सलाम कहती है

    निसार हो के तुम्हारे ही रुख़ की रंगत पर

    जहान-भर की सबाहत सलाम कहती है

    तुम्ही हो सारे शहीदों की सरबराही को

    तुम्ही को सारी क़यादत सलाम कहती है

    तुम्हें मिली है शहामत कुछ ऐसी हैदर से

    बहादुरों की शुजा'अत सलाम कहती है

    सफ़-ए-शहीदाँ में यकता हो तुम्ही नादिर हो

    तुम्ही को ज़ेब है नुदरत सलाम कहती है

    तुम्ही नक़ीब हो बैत-ए-नबी के या मौला

    ख़ुशा नसीब नक़ाबत सलाम कहती है

    है जिन का पाक लहू वो सलामी देते हैं

    हलाल ख़ून की ग़ैरत सलाम कहती है

    हर एक साहिब-ए-ईमान का ये कहना है

    हमारे कलिमा की शौकत सलाम कहती है

    तुम्ही हो जिस से हदीक़े-जहाँ मो'अत्तर है

    तमाम ’इत्रों की निकहत सलाम कहती है

    तुम्हारे चेहरा-ए-दिलकश के दीद की ख़ातिर

    मिरी निगाहों की हसरत सलाम कहती है

    ये दिल की धड़कनें तुम को ही याद करती है

    तुम्हारी याद की लज़्ज़त सलाम कहती है

    बक़ा-ए-दीन के ख़ातिर जो तुम ने हिज्रत की

    तुम्हें नबी की भी हिज्रत सलाम कहती है

    रवाना कीजिए अपने प्यारे मेहदी को

    हुसैनियों की ज़रूरत सलाम कहती है

    मुझे ज़ियारत-ए-कर्बल का जल्द मुज़्दा हो

    मिरी उम्मीद की 'उजलत सलाम कहती है

    दिया है मुझ को मिरे पीर ने कमाल-ए-फ़न

    मिरे सुख़न की लताफ़त सलाम कहती है

    मिरे नसीब में आया सलाम का लिखना

    नफ़स नफ़स की स'आदत सलाम कहती है

    तिरा निशान-ए-कफ़-ए-पा हो और दम निकले

    मिरी हयात की चाहत सलाम कहती है

    कलाम-ए-मौलवी-ओ-जामी हाफ़िज़-ओ-सा'दी

    तुम्ही को उन की लियाक़त सलाम कहती है

    क़ुबूल कीजिए आक़ा फ़न्न-ओ-सुख़न मेरा

    तमाम मिसरों की रंगत सलाम कहती है

    असर किया शह-ए-वारिस के करम ने ऐसा

    कि मेरी जान-ओ-'अक़ीदत सलाम कहती है

    फ़क़त 'असर' तू अकेला नहीं सलामी को

    तमाम नबियों की उम्मत सलाम कहती है

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