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साखी
सतसंग का अंग - 'कबीर' संगत साध की हरै और की ब्याधि
कबीर संगत साध की हरै और की ब्याधिसंगत बुरी असाध की आठो पहर उपाधि
कबीर
पद
सत संगत से पार परो भवमद सबहि झरो
सत संगत से पार परो भवमद सबहि झरोजगजीवन मो उगमो निगमो अभेद भाव भरो
अनंत महाराज
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शबद
उलटमासी - जिंदड़ी दा साहिब बेली वे
'तुलसी' सोध बोध सतगुरु को ये संगत अलबेली वे
तुलसी साहिब हाथरस वाले
पद
स्वजीवन के पद - भाभी बोलो वचन विचारी
भाभी बोलो वचन विचारीसाधों की संगत दुख भारी मानो बात हमारी
मीराबाई
पद
प्रेम-मार्ग प्रेमदा पेड़ो सब दा न्यारो
नेम अचार येकई राखै संगत राखै सचारोअभै असोच सोच ना आनै कोउ जन जानि निहारो
बाबा किनाराम
शबद
बिंती और प्रार्थना का अंग - प्रभू को तन मन धन सब दीजै
जब तें प्रीत लगी चरणन सों जग संगत नहिं कीजैदीन-दयाल कृपाल दया-निध जौ आपन करि लीजै
गुलाल साहब
होली
अब मैं को बैराग दियो है आप रहत रंग भीनों रे'नियाज़' को हमरी संगत से सौतन बैरन छीनो रे
शाह नियाज़ अहमद बरेलवी
सूफ़ी लेख
ज़िक्र-ए-ख़ैर ख़्वाजा रुकनुद्दीन इश्क़
ग़लत है इधर या उधर जाएंगेजिधर तुम चलोगे उधर जाएंगे