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शे'र
वो तजल्ली जिस ने दश्त-ए-आरज़ू चमका दियाकुछ तो मेरे दिल में है और कुछ कफ़-ए-मूसा में है
मुज़तर ख़ैराबादी
सूफ़ी उद्धरण
तसव्वुर (ध्यान) ही असली चीज़ है। तसव्वुर को इतना मज़बूत करना चाहिए कि अपने पीर की सूरत के अलावा कोई सूरत नज़र न आए।
शाह जी मोहम्मद शेर मियाँ
नज़्म
कव्वे और हिरन की दोस्ती
इक दश्त में सुना है कि इक ख़ूब था हिरनबच्चा ही था अभी न हुआ था बड़ा हिरन
नज़ीर अकबराबादी
रेख़्ता
सिद्क़ रहबर सब्र तोशा, दश्त मंज़िल दिल रफ़ीक़।
सिद्क़ रहबर सब्र तोशा, दश्त मंज़िल दिल रफ़ीक़।सत्त नगरी, धर्म राजा जोग मारग निरमला।।
अब्दुल क़ुद्दूस गंगोही
सूफ़ी लेख
दूल्हा और दुल्हन का आरिफ़ाना तसव्वुर
दूल्हा और दुल्हन बहुत आम फ़हम अलफ़ाज़ हैं। इनकी तहज़ीबी हैसियत और समाजी मानविय्यत से वो
शमीम तारिक़
ग़ज़ल
तस्वीर-ए-तसव्वुर में उन की जिस वक़्त जमाई जाती हैउस पर्दा-नशीं को देखने की फिर ताब न लाई जाती है
अमीर बख़्श साबरी
ग़ज़ल
दश्त-ए-पैमाई से है अपनी बयाबाँ नाज़ाँअपनी पा-पोश से है ख़ार-ए-मुग़ीलाँ नाज़ाँ


