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कलाम
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
लगा कर दिल किसी से कोई रुस्वा-ए-जहाँ क्यूँ होगिरफ़्तार-ए-बला-ए-ग़म-नवा संज-ए-फ़ुग़ाँ क्यूँ हो
मजीदुल्लाह बेख़ुदी
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कलाम
बनाई मुझ बे-नवा की बिगड़ी नसीब मेरा जगा दियातेरे करम के निसार तू ने मुझे भी जीना सिखा दिया
अज्ञात
शे'र
मैं हूँ एक आशिक़-ए-बे-नवा तू नवाज़ अपने पयाम सेये तिरी रज़ा पे तिरी ख़ुशी तू पुकार ले किसी नाम से
फ़ना बुलंदशहरी
शे'र
रियाज़ ख़ैराबादी
शे'र
मैं हूँ एक आ’शिक़-ए-बे-नवा तू नवाज़ अपने पयाम सेये तिरी रज़ा पे तिरी ख़ुशी तू पुकार ले किसी नाम से
फ़ना बुलंदशहरी
कलाम
फ़क़ीर-ए-बे-नवा का साज़-ओ-सामाँ देखते जाओकि शान-ए-फ़क़्र-ओ-फ़ख़्री है नुमायाँ देखते जाओ
शाह मोहसिन दानापुरी
फ़ारसी कलाम
मुतरिब-ए-ख़ुश-नवा बगो ताज़:-ब-ताज़: नौ-ब-नौबाद:-ए-दिल-कुशा ब-जो ताज़:-ब-ताज़: नौ-ब-नौ
हाफ़िज़
ग़ज़ल
शहीद-ए-इ’श्क़-ए-मौला-ए-क़तील-ए-हुब्ब-ए-रहमानेजनाब-ए-ख़्वाजः क़ुतुबुद्दीं इमाम-ए-दीन-ओ-ईमाने
वाहिद बख़्श स्याल
सूफ़ी कहावत
रू-ए ज़ेबा मरहम-ए-दिलहा-ए-ख़स्ता अस्त-ओ-कलीद-ए-दरहा-ए-बस्ता
एक ख़ूबसूरत चेहरा दुखी दिलों के लिए मरहम की तरह होता है, और बंद दरवाजों के लिए कुंजी
वाचिक परंपरा
ना'त-ओ-मनक़बत
गुल-ए-बुस्तान-ए-मा'शूक़ी मह-ए-ताबान-ए-महबूबीनिज़ामुद्दीन सुल्तान-उल-मशाइख़ जान-ए-महबूबी


