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अरिल्ल
राम नाम की लूट फबी है जीव कूँ
राम नाम की लूट फबी है जीव कूँनिस बासुरि 'बाजीद' सुमर ताहि पीव कूँ
वाजिद जी दादूपंथी
ना'त-ओ-मनक़बत
साइम चिश्ती
नज़्म
।। लोभ ।।
संतोष तवक्कुल हिरनों ने जब हिर्स की खेती आन चरी।फिर देख तमाशे क़ुदरत के और लूट बहारें हरी भरी।
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
चाँद सा मुखड़ा उस ने दिखा कर फिर नैनाँ के बाँड़ चला करसाँवरिया ने बीच-बजरिया लूट लियो इस निर्धन को
सवैया
नेत्रोपालम्भ- जमुना-तट बीर गई जब ते तब तें जग के मन माँझ तहौ।
जमुना-तट बीर गई जब ते तब तें जग के मन माँझ तहौ।ब्रज मोहन गोहन लागि भटू हौ लटू भई लूट सी लाख लहौ।