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ना'त-ओ-मनक़बत
मत्मह-ए-अहल-ए-विला है सूरत-ए-तेग़-ए-अ’लीक़ाबिल-ए-मदह-ओ-सना है सीरत-ए-तेग़-ए-अ’ली
वासिफ़ रज़ा वासिफ़
दोहरा
बुल्ल्हआ जैसी सूरत ऐन दी, तैसी सूरत ग़ैन।
बुल्ल्हआ जैसी सूरत ऐन दी, तैसी सूरत ग़ैन।इक नुक्कते दा फेर है , भुल्ला फिरे जहान ।
बुल्ले शाह
सूफ़ी उद्धरण
मुरीद अगर अपनी ज़ाहिरी शक्ल-ओ-सूरत पीर की तरह न कर सके, तो उस से आगे और क्या होगा।
मुरीद अगर अपनी ज़ाहिरी शक्ल-ओ-सूरत पीर की तरह न कर सके, तो उस से आगे और क्या होगा।
मख़दूम ख़ादिम सफ़ी
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
गुफ़्ता ब-सूरत अर चे ज़े औलाद-ए-आज़रमअज़ रूए मर्तबा ब-हम: हाल बर-तरम
मिर्ज़ा मज़हर जान-ए-जानाँ
ना'त-ओ-मनक़बत
अजमेर को ख़्वाजा तोरी सूरत सपने में दिखा एक नजरियातोरा दर्शनवा देखन मोरा जिया तरसत है ओ साँवरिया
इमामुद्दीन अली चिश्ती
ग़ज़ल
क्या ये सूरत-गरी ऐ जज़्बा-ए-दिल होती जाती हैकि वो सूरत निगाहों के मुक़ाबिल होती जाती है


