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ग़ज़ल
ख़ुद अपने अश्कों ने रुस्वा किया मुझ को सर-ए-महफ़िलदयार-ए-दोस्ताँ से दुश्मनाँ तक बात आ पहुँची
अब्दुल मन्नान तरज़ी
ग़ज़ल
तिरे ग़म को सुकून-ए-ख़ातिर-ए-जाँ कर के छोड़ूँगामैं दर्द-ए-दिल को दर्द-ए-दिल का दर्माँ कर के छोड़ूँगा
अफ़क़र मोहानी
कलाम
जिसे मैं शाम-ए-ग़ुर्बत इक शुगून-ए-नहस समझा थावो तारा रहनुमा-ए-सुब्ह-ए-मंज़िल होता जाता है
सीमाब अकबराबादी
फ़ारसी कलाम
दीवान:-ए-हुस्न-ए-वयम हाज़ा जुनून-उल-आशिक़ीनमस्त अज़ शराब-ए-हैरतम हाज़ा जुनून-उल-आशिक़ीन
औहदी
पद
सत्संग-उपदेश का अंग - जूनुं थयुं रे देवल जूनुं तो थयुं
जूनुं थयुं रे देवल जूनुं तो थयुंम्हारो हंसलो नानो ने देवल जूनुं तो थयुं