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सूफ़ी कहावत
चुँ यार अहल अस्त, कार सहल अस्त
जब हमारे साथी क्षमता रखने वाले होते हैं तो काम आसान हो जाता है।
वाचिक परंपरा
शे'र
ऐ ग़म मुझे याँ अहल-ए-तअय्युश ने है घेराइस भीड़ में तू ऐ मिरे ग़म-ख़्वार कहाँ है
अ’ब्दुल रहमान एहसान देहलवी
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ना'त-ओ-मनक़बत
अहल-ए-हवस की लुक़्मा-ए-तर पर रही नज़रनान-ए-जवीं पे सिर्फ़ गुज़ारा 'अली का है
पीर नसीरुद्दीन नसीर
ग़ज़ल
नक़्द-ए-जान-ओ-दिल-ओ-दीं दे के लिया हम ने तुम्हेंसैकड़ों अहल-ए-हवस गरचे ख़रीदार हुए
मीर मोहम्मद बेदार
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
शाह रा ख़्वाही कि बीनी ख़ाक शो दरगाह राज़े-आबरू आबी ब-ज़न दरगाह-ए-शाहंशाह रा
हकीम सनाई
ग़ज़ल
वहीं पर जाके ठहरा अहल-ए-दिल अहल-ए-दिल का कारवाँ पहलेमोहब्बत ने किसी की ली थी अंगड़ाई जहाँ पहले
महमूद अ’ली सबा
ग़ज़ल
कहते हैं अहल मोहब्बत जिस को मे'राज-ए-बक़ानूर बन कर तेरे जल्वों में ही खो जाने का नाम