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बैत
ग़म ब-ज़ाहिर तो बहुत तल्ख़ है लेकिन ऐ 'आह'
ग़म ब-ज़ाहिर तो बहुत तल्ख़ है लेकिन ऐ 'आह'यही इंसान को इंसान बना देता है
आह संभली
शे'र
न पूछो बे-नियाज़ी आह तर्ज़-ए-इम्तिहाँ देखोमिलाई ख़ाक में हँस हँस के मेरी आबरू बरसों
अज़ीज़ सफ़ीपुरी
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विशेष
शे'र
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