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रूबाई
जो खींच चुके हैं गर्म-ओ-सर्द-ए-दुनियाकहते हैं जहाँ में उन को मर्द-ए-दुनिया
ख़्वाजा रुक्नुद्दीन इश्क़
दोहा
लालन लाल मराल पिक चकी चका पोषैन
लालन लाल मराल पिक चकी चका पोषैनसदा सारिका सुकहूँ राखि कह 'जमाल' का चैन
जमाल
दोहा
रहिमन वे नर मर चुके जे कहुँ माँगन जाहिं
रहिमन वे नर मर चुके जे कहुँ माँगन जाहिंउनते पहिले वे मुए जिन मुख निकसत नाहिं
रहीम
सूफ़ी उद्धरण
पैसा न भी हो, तो भी तंदरुस्ती, इल्म और आज़ादी इन्सान की अज़ीम ख़ुशहाली है।
पैसा न भी हो, तो भी तंदरुस्ती, इल्म और आज़ादी इन्सान की अज़ीम ख़ुशहाली है।
अज्ञात
कलाम
क़ाज़ी उमराव अली जमाली
ग़ज़ल
मुसख़्ख़र कर चुका हर एक मय-कश को वक़ार अपनातिरी मस्ती पे सब्क़त ले गया साक़ी ख़ुमार अपना
मंज़र सिद्दीक़ी
दोहा
विनय मलिका - चकई कल में होत है भान उदय आनंद
चकई कल में होत है भान उदय आनंद'दयादास' के दृगन तें पल न टरो ब्रज-चंद
दया बाई
ना'त-ओ-मनक़बत
चलते चलते रुक चुकी थी जबकि नब्ज़-ए-काएनातनौ’-ए-इंसानी की थी हर इक तमन्ना बे-सबात