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शे'र
मेरी ज़िंदगी पे न मुस्कुरा,मुझे ज़िंदगी का अलम नहींजिसे तेरे ग़म से हो वास्ता वो ख़िज़ाँ बहार से कम नहीं
शकील बदायूँनी
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
ब-क़ामत ख़ून-ए-आ'लम रेख़्ती पोशीद: पोशीद:क़यामत दामनत रा बोस: ज़द तर्सीद: तर्सीद:
ग़ुलाम इमाम शहीद
ग़ज़ल
खुला दरवाज़ा मेरे दिल पे अज़-बस और आ'लम कान अंदेशा है शादी का मुझे ने फ़िक्र है ग़म का
ख़्वाजा मीर दर्द
शे'र
पढ़ पढ़ इ’ल्म हज़ार कताबाँ आ’लिम होए भारे हूहर्फ़ इक इ’श्क़ दा पढ़ न जाणन भुल्ले फिरन विचारे हू
सुल्तान बाहू
कलाम
पढ़ पढ़ इलम हज़ार कताबाँ आलिम होए भारे हूहर्फ़ इक इश्क़ दा पढ़ न जाणन भुल्ले फिरन विचारे हू
सुल्तान बाहू
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
यार-ए-बे-रह्म-ए-मन अज़ दर्द बे-जानम चे कुनममन चुनीं यारम चुनाँ आह न-दानम चे कुनम
नूरुद्दीन हिलाली
ग़ज़ल
दलील-ए-सुब्ह रौशन है सियह शाम-ए-अलम साक़ीख़ुदा का बा'द हर मुश्किल के होता है करम साक़ी






