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ग़ज़ल
ग़म की इंतिहा 'क़ैसर' इब्तिदा है ख़ुशियों कीग़म का बोझ भारी है सिर्फ़ ग़म उठाने तक
क़ैसर सिद्दीक़ी समस्तीपुरी
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कलाम
किसी दर्दमंद के काम आ किसी डूबते को उछाल देये निगाह-ए-मस्त की मस्तियाँ किसी बद-नसीब पे डाल दे
अज्ञात
ना'त-ओ-मनक़बत
मंज़र फ़ज़ा-ए-दहर में सारा 'अली का हैजिस सम्त देखता हूँ नज़ारा 'अली का है
पीर नसीरुद्दीन नसीर
ग़ज़ल
क़ैसर शाह वारसी
ग़ज़ल
इस गोशा-ए-तन्हाई से अब निकलो ख़ुदा-रा'क़ैसर' तुम्हें कुछ अहल-ए-क़लम ढूँड रहे हैं
क़ैसर सिद्दीक़ी समस्तीपुरी
शे'र
क़ैसर शाह वारसी
दोहा
विनय मलिका - जैसे सूरज के उदय सकल तिमिर नस जाय
जैसे सूरज के उदय सकल तिमिर नस जायमेहर तुम्हारी हे प्रभु क्यूँ अज्ञान रहाय
दया बाई
ग़ज़ल
आज तो 'क़ैसर'-ए-हज़ीं ज़ीस्त की राह मिल गईआ के ख़याल-ओ-ख़्वाब में शक्ल दिखा गया कोई
क़ैसर शाह वारसी
ना'त-ओ-मनक़बत
वो जिस की ज़ात आली नाज़िश-ए-कौनैन है 'क़ैसर'उसी फ़ख़्रुल-रुसुल ख़ैरुल-बशर की बात करते हैं