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कलाम
उन से अच्छी नहीं देखी कोई सूरत 'क़ैसर'हैं सरापा ये मोहब्बत ही मोहब्बत 'क़ैसर'
क़ैसर सिद्दीक़ी समस्तीपुरी
ग़ज़ल
ग़म की इंतिहा 'क़ैसर' इब्तिदा है ख़ुशियों कीग़म का बोझ भारी है सिर्फ़ ग़म उठाने तक
क़ैसर सिद्दीक़ी समस्तीपुरी
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कलाम
किसी दर्दमंद के काम आ किसी डूबते को उछाल देये निगाह-ए-मस्त की मस्तियाँ किसी बद-नसीब पे डाल दे
अज्ञात
कलाम
'क़ैसर' की इस कविता से कुछ तो नसीहत ले लेछोड़ के नेकी काहे पगले पाप के पापड़ बेले
क़ैसर सिद्दीक़ी समस्तीपुरी
कलाम
क़ैसर सिद्दीक़ी समस्तीपुरी
कलाम
कि हक़्क़-ए-आदमियत यूँ ही ऐ 'क़ैसर' अदा होगाभलाई कर भला होगा बुराई कर बुरा होगा
क़ैसर सिद्दीक़ी समस्तीपुरी
ना'त-ओ-मनक़बत
बहार तैबा के मंज़र हमें रुलाते हैंजो लम्हे तैबा में गुज़ारे वो याद आते हैं
आबिद अली अत्तारी
ग़ज़ल
इस गोशा-ए-तन्हाई से अब निकलो ख़ुदा-रा'क़ैसर' तुम्हें कुछ अहल-ए-क़लम ढूँड रहे हैं
क़ैसर सिद्दीक़ी समस्तीपुरी
दोहा
विनय मलिका - जैसे सूरज के उदय सकल तिमिर नस जाय
जैसे सूरज के उदय सकल तिमिर नस जायमेहर तुम्हारी हे प्रभु क्यूँ अज्ञान रहाय
दया बाई
ना'त-ओ-मनक़बत
मंज़र फ़ज़ा-ए-दहर में सारा 'अली का हैजिस सम्त देखता हूँ नज़ारा 'अली का है