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सूफ़ी कहावत
अगर शबहा-ए-हमा शब-ए-क़द्र बूदे, शब-ए-क़द्र बे-क़द्र बूदे
अगर हर रात शब-ए-क़द्र होती, तो शब-ए-क़द्र की कोई महानता नहीं होती।
वाचिक परंपरा
कलाम
दिया होता किसी को दिल तो होती क़द्र भी दिल कीहक़ीक़त पोछिए जा कर किसी बिस्मिल से बिस्मिल की
अज्ञात
शे'र
वाबस्ता है हमीं से गर जब्र है ओ गर क़द्रमजबूर हैं तो हम हैं मुख़्तार हैं तो हम हैं