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शे'र
सीमाब अकबराबादी
ग़ज़ल
मिरा दम घुट के मक़्तल में तन-ए-बिस्मिल से निकलेगाफ़ुग़ाँ मुँह से न निकलेगी न नाला दिल से निकलेगा
हशम लखनवी
पद
ककहरा - घघ्घा घर भूले सब बाट घाट घट ना मिलै
घघ्घा घर भूले सब बाट घाट घट ना मिलैआद पुरूष पद छाँड़ि काल घर को चलै
तुलसी साहिब हाथरस वाले
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झूलना
घट घट में रचना होय रही स्रुति सैल से संत निहारते हैं
घट घट में रचना होय रही स्रुति सैल से संत निहारते हैंसत मत का अंत लखाव लखै सो पकाय के पार सुनावते हैं
तुलसी साहिब हाथरस वाले
साखी
प्रेम का अंग - जा घट प्रेम न संचरै सो घट जानु समान
जा घट प्रेम न संचरै सो घट जानु समानजैसे खाल लोहार की साँस लेत बिन प्रान
कबीर
ना'त-ओ-मनक़बत
दिल में घुट-घुट कर रही जाती हैं दिल की हसरतेंकूचा-ए-महबूब में मेला लगा हो मैं न हूँ
आरिफ़ नक़्शबंदी
ग़ज़ल
न निकलेंगे तो क्या अरमाँ न निकलेंगे मिरे दिल केतो क्या घुट-घुट के मर जाएगी मेरी आरज़ू दिल में
बेदम शाह वारसी
पद
सोही ब्रह्म सनाथ जगाय सब घट माहीं समाय
सोही ब्रह्म सनाथ जगाय सब घट माहीं समायसमभावन की बडि चतुराई जनम जनम की कमाय
अनंत महाराज
पद
सुरत का अनुभव - झूलत घट में सुरत हिण्डोला बाजत अनहद शब्द अमोला
झूलत घट में सुरत हिण्डोला बाजत अनहद शब्द अमोलाधुन की डोरी लगी अधर में सुरत निरत रहि झाँक अधर में
शालीग्राम
ग़ज़ल
सीमाब अकबराबादी
साखी
प्रेम का अंग - प्रेंम छिपाया ना छिपै जा घट परघट होय
प्रेंम छिपाया ना छिपै जा घट परघट होयजो पै मुख बोलै नहीं तो नैन देत हैं रोय
कबीर
साखी
सेवक और दास का अंग - सब घट मेरा साइयाँ सूनी सेज न कोय
सब घट मेरा साइयाँ सूनी सेज न कोयबलिहारी वा-घट्ट की जा-घट पर-गट होय
कबीर
दोहा
रहिमन रीति सराहिए जो घट गुन सम होय
रहिमन रीति सराहिए जो घट गुन सम होयभीति आप पै डारि कै सबै पिआवै तोय
रहीम
साखी
सेवक और दास का अंग - जा घट में साईं बसै सो क्यों छाना होय
जा घट में साईं बसै सो क्यों छाना होयजतन जतन करि दाबिये तौ उँजियारा सोय
कबीर
पद
ककहरा - भभ्भा भगी सुरति घट माहिँ जाय जो देखा भाई
भभ्भा भगी सुरति घट माहिँ जाय जो देखा भाईसुखमनि सेज सँवारि सुन्नी में सुरति लगाई
तुलसी साहिब हाथरस वाले
ग़ज़ल
सोहनी सूरत वेख लबां तों वारी जान प्यारीमत्त हिक घुट लभ्भे इस जामों इह ख़्याल असाडे