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शे'र
मुझ से लगे हैं इ'श्क़ की अ'ज़्मत को चार चाँदख़ुद हुस्न को गवाह किए जा रहा हूँ मैं
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
कुछ आरज़ू से काम नहीं 'इश्क़' को सबामंज़ूर उस को है वही जो हो रज़ा-ए-गुल
ख़्वाजा रुक्नुद्दीन इश्क़
शे'र
सरसब्ज़ गुल की रखे ख़ुदा हर रविश बहारऐ बाग़बाँ नसीब हो तुझ को बला-ए-गुल
ख़्वाजा रुक्नुद्दीन इश्क़
शे'र
सरसब्ज़ गुल की रखे ख़ुदा हर रविश बहारऐ बाग़बाँ नसीब हो तुझ को बला-ए-गुल
ख़्वाजा रुक्नुद्दीन इश्क़
शे'र
इ'श्क़ में तेरे गुल खा कर जान अपनी दी है 'नसीर' ने आहइस के सर-ए-मरक़द पर गुल रोला कोई दोना फूलों का
शाह नसीर
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
ऐ ज़ाहिदाँ ऐ ज़ाहिदाँ ता चंद ज़ीं तदबीर-हाऐ ग़ाफ़िलाँ ऐ ग़ाफ़िलाँ ता चंद ज़ीं हिर्स-ओ-हवा
रूमी
शे'र
गरचे कैफ़ियत ख़ुशी में उस की होती है दो-चंदपर क़यामत लुत्फ़ रखती है ये झुँझलाने की तरह
ख़्वाजा रुक्नुद्दीन इश्क़
शे'र
फूले नहीं समाते हो जामा में मिस्ल-ए-गुलपहुँचा है तुम को आज कसो का पयाम-ए-ख़ास