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शे'र
कोई रश्क-ए-गुलिस्ताँ है तो कोई ग़ैरत-ए-गुलशनहुए क्या क्या हसीं गुलछर्रः पैदा आब-ओ-गिल से
शाह अकबर दानापूरी
ग़ज़ल
तिरे चाक-ए-गरेबाँ से तुझे दर्द-आश्ना समझाख़मोशी को तिरी समझा मोहब्बत की ज़बाँ मैं ने
सूफ़ी तबस्सुम
कलाम
कनजड़े की सी हाट है दुनिया जिंस है सारे इकट्ठेमीठे चाहे मीठे ले ले खट्टे चाहे खट्टे
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
कहीं है आँख आ'शिक़ की कहीं दीदार-ए-जानाँ हैबहार-ए-हुस्न-ए-ताबाँ में तू ही तू है तू ही तू है
चौधरी दल्लू राम कौसरी
दोहा
तन निर्मल कर बूझिए मन की अधिकै सीख
तन निर्मल कर बूझिए मन की अधिकै सीखवहोवा मअ'कुम के भेद सों फिर फिर आपै देख
बरकतुल्लाह पेमी
दोहा
सिख का माना सतगुरू गुरु झिड़कै लख बार
सिख का माना सतगुरू गुरु झिड़कै लख बार'सहजो' द्वार न छोड़िये यही धारना धार