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ग़ज़ल
मिरे होश में वो ठहरे न कभी फिर होश के दिन ही बीत गएवो आए गए तो बहुत लेकिन बे-रुत आए बे-रीत गए
मयकश अकबराबादी
कलाम
होश किसी का भी न रख जल्वा-गाह-ए-नमाज़ मेंबल्कि ख़ुदा को भूल जा सज्दा-ए-बे-नियाज़ में
