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ना'त-ओ-मनक़बत
जिस रंग में ऐ यार मुझे तू नज़र आयाऐसा कोई गुल भी नहीं ख़ुश-रू नज़र आया
अब्दुल रहीम कुंजपूरी
ग़ज़ल
जब से हुआ है वो बुत-ए-’अय्यार यार याररोता हूँ तब से बरसर-ए-बाज़ार ज़ार ज़ार
ख़्वाजा रुक्नुद्दीन इश्क़
सूफ़ी कहावत
ख़लवत अज़ अग़्यार बायद ने ज़े यार
अजनबियों से अलग रहना चाहिए, दोस्तों से नहीं।
वाचिक परंपरा
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विषय
आ’शिक़
आशिक़
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सूफ़ी लेख
ज़िक्र-ए-ख़ैर ख़्वाजा रुकनुद्दीन इश्क़
ख़्वाजा रुकनुद्दीन इश्क़ एक महान सूफ़ी शा’इर हुए हैं। अगर उनकी ज़िंदगी और शाइरी पर नज़र
रय्यान अबुलउलाई
ग़ज़ल
करता हूँ अब के बार मैं तौबा से तौबा यारकिस वास्ते कि टूटी है तौबा हज़ार बार
ख़्वाजा रुक्नुद्दीन इश्क़
ना'त-ओ-मनक़बत
क्या ही सूरत है मिरी यार की अल्लाह अल्लाहमेरी सूरत मिरी दिलदार की अल्लाह अल्लाह



