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क़िता'
ग़ुलामी की फ़ज़ाओं में नया फूँका फ़ुसूँ मैं नेकिया एलान-ए-आज़ादी ब-अंदाज़-ए-जुनूँ मैं ने
फ़ितरत वारसी
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
आ’शिक़ाँ अंदर जमाल-ए-ख़ूब-रूयाँ माँदःअंदनुस्ख़ा-ए-हमराह-ए-आँ नाम-ए-इलाही ख़वाँदःअंद
लाल शहबाज़ क़लंदर
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
वजूद-ए-मह्ज़-ए-मुत्लक़ रा हमः जा हर ज़माँ दीदमब-हर सूए ब-हर कूए ब-हर सूरत अ’याँ दीदम
लाल शहबाज़ क़लंदर
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कलाम
अगरचे नफ़्स-ए-अम्मारा में ये जुम्बिश नहीं होतीतो हरगिज़ ख़ुल्द में आदम से यूँ लग़्ज़िश नहीं होती
अज़ीज़ुद्दीन रिज़वाँ क़ादरी
सूफ़ी कहावत
ज़माना बा तू नासाज़द, तू बा ज़माना साज़।
अगर समय आपके लिए उपयुक्त नहीं हैं, तो आप खुद को उनके अनुसार बदलें।
वाचिक परंपरा
सूफ़ी लेख
क़व्वाली के इब्तिदाई साज़, राग ताल और ठेके
क़व्वाली के इब्तिदाई साज़ों की तफ़्सील किसी एक मज़मून या किताब से दस्तयाब नहीं होती, अलबत्ता
अकमल हैदराबादी
फ़ारसी कलाम
ऐ माह-ए-'आलम सोज़-ए-मन अज़ मन चिरा रंजीद:-ईवै शम-ए'-शब अफ़्रोज़-ए-मन अज़ मन चिरा रंजीद:-ई


