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लाल शहबाज़ क़लंदर

1117 - 1274 | पाकिस्तान

लाल शहबाज़ क़लंदर

फ़ारसी कलाम 1

 

फ़ारसी सूफ़ी काव्य 16

सूफ़ी उद्धरण 5

मैं हर लम्हा महबूब की मुहब्बत में जल रहा हूँ। एक पल मैं मिट्टी पर लिखता हूँ, तो एक पल काँटों पर नाचता हूँ।

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मुझे मुहब्बत, नशे और वज्द के सिवा कुछ मालूम नहीं।

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मैंने अपने ज़हन से दुई को मिटा दिया है और दोनों जहानों को एक देखा, सो मैं एक देखता हूँ, एक तलाश करता हूँ, एक जानता हूँ और एक का ही ऐलान करता हूँ।

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शरीअत कश्ती है, तरीक़त बादबाँ है और हक़ीक़त जहाज़ का लगंर है। अक़्ल अकेली ज़िंदगी के समंदर का रास्ता नहीं ढूँढ सकती।

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हक़ीक़त का दीदार मेरी अज़ीयत का इलाज है। देखने वाली आँख हमारे लिए सच्ची दलील है।

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