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शबद
बिनय का अंग - काह कहौं कछु कहि नहिं आवै
काह कहौं कछु कहि नहिं आवैकाह कहौं कछु कहि नहिं आवै
दूलनदास जी
दोहा
काह कहूँ कुछ बन नहीं आवत सुनो गरीब-नवाज
काह कहूँ कुछ बन नहीं आवत सुनो गरीब-नवाजदीन-दयाल हरो दुख संकट लाज-पति महाराज
अमीनुद्दीन वारसी
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विशेष
कह मुकरनी
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शबद
सावन व हिण्डोला - जबतें लगन लगी री तब तें कानि काह की सखी री
जबतें लगन लगी री तब तें कानि काह की सखी रीमैं प्यासी अपने पिय के री बिन पिय प्यास मिटै न सखी री
जगजीवन साहेब
शे'र
मैं हाथ में हूँ बाद के मानिंद पर-ए-काहपाबंद न घर का हूँ न मुश्ताक़ सफ़र का
ख़्वाजा रुक्नुद्दीन इश्क़
पद
प्रकीर्ण के पद - शिव के मन महीं बसी कासी
काह करन को ब्राह्मण बनिया काह करन को सन्यासीनेम धरम को ब्राह्मण बनिया तप करने को सन्यासी
मीराबाई
सूफ़ी कहावत
आंजा रौ कि बख्वांदत ना आंजा कि बरानंदत
वहाँ जाओ जहाँ तुम्हें बुलाया जाता है, न कि वहाँ जहाँ तुम्हें जाने को मजबूर किया जाता है
वाचिक परंपरा
सूफ़ी कहावत
बा तमन्ना-ए-गोश्त मुर्दन बेह कि तक़ाज़ा-ए-ज़िश्त-ए-क़स्साबाँ
बुरे क़साई से गोश्त की मांग करने से बेहतर है कि गोश्त की तमन्ना ही न की जाए
वाचिक परंपरा
राग आधारित पद
रागिनी श्री गौरी चौताल - धौरी-धूमर पीयरी-काजर कहि-कहि टेरै
धौरी-धूमर पीयरी-काजर कहि-कहि टेरैमोर मुकट सीस स्रवन कुंडल कटि में पीतांबर पहिरै
तानसेन
शे'र
मक़्दूर क्या जो कह सुकूँ कुछ रम्ज़-ए-इ’श्क़ कोजूँ शम्अ' हूँ अगरचे सरापा ज़बान-ए-इ’श्क़