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साखी
चितावनी का अंग - 'कबीर' नाव है झाँझरी कूरा खेवनहार
'कबीर' नाव है झाँझरी कूरा खेवनहारहलके हलके तिर गये बूड़े जिन सिर भार
कबीर
साखी
चितावनी का अंग - 'कबीर' नाव तो झाँझरी भरी बिराने भार
'कबीर' नाव तो झाँझरी भरी बिराने भारखेवट से परिचय नहीं क्यूँकर उतरै पार
कबीर
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साखी
प्रेम का अंग - 'कबीर' प्याला प्रेम का अंतर लिया लगाय
'कबीर' प्याला प्रेम का अंतर लिया लगायरोम रोम में रमि रहा और अमल बया खाय
कबीर
दोहा
झगड़ा मौत कबीर पर, गाढ़े या जलवाय
झगड़ा मौत कबीर पर, गाढ़े या जलवायफूल डाल मुझ बावरा, ले गयो उसे उठाय
डॉ. अफ़रोज़ ताज
साखी
सतसंग का अंग - 'कबीर' खाई कोट की पानी पिवै न कोय
'कबीर' खाई कोट की पानी पिवै न कोयजाइ मिलै जब गंग से सब गंगोदक होय
कबीर
साखी
सतसंग का अंग - 'कबीर' चंदन के निकट नीम भी चंदन होय
'कबीर' चंदन के निकट नीम भी चंदन होयबूड़े बाँस बड़ाइया यों जनि बूड़ो कोय
कबीर
साखी
सूक्ष्म का अंग - 'कबीर' मारग कठिन है कोई सकै न जाय
'कबीर' मारग कठिन है कोई सकै न जायगया जो सो बहुरै नहीं कुसल कहै को जाय
कबीर
साखी
बिरह का अंग - 'कबीर' चिनगी बिरह की मो तन पड़ी उड़ाय
कबीर चिनगी बिरह की मो तन पड़ी उड़ायतन जरि धरती हू जरी अंबर जरिया जाय
कबीर
साखी
प्रेम का अंग - 'कबीर' हम गुरु रस पिया बाक़ी रही न छाक
'कबीर' हम गुरु रस पिया बाक़ी रही न छाकपाका कलस कुम्हार का बहुरि ते चढ़सी चाक
कबीर
साखी
सेवक और दास का अंग - 'कबीर' गुरू सब को चहैं गुरू को चहै न कोय
कबीर गुरू सब को चहैं, गुरू को चहै न कोयजब लग आस सरीर की तब लग दास न होय
कबीर
साखी
सतसंग का अंग - 'कबीर' मन पंछी भया भावै तहवाँ जाय
'कबीर' मन पंछी भया भावै तहवाँ जायजो जैसी संगति करै सो तैसा फल खाय
कबीर
पद
कहै 'कबीर' विचारि कै जा कै बर्न न गाँव
कहै 'कबीर' विचारि कै जा कै बर्न न गाँवनिराकार और निर्गुना है पूरन सब ठाँव
कबीर
साखी
सूक्ष्म का अंग - 'कबीर' मारग कठिन है सब मुनि बैठे थाकि
'कबीर' मारग कठिन है सब मुनि बैठे थाकितहाँ 'कबीरा' चढ़ि गया गहि सत-गुरु की साखि
कबीर
साखी
चितावनी का अंग - 'कबीर' जंत्र न बाजई टूटि गया सब तार
'कबीर' जंत्र न बाजई टूटि गया सब तारजंत्र बिचार: क्या करै चला बजावनहार

