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क़िता'
क्या करूँ महफ़िल में जब वो रौनक़-ए-महफ़िल नहींलुत्फ़-ए-सैर-ए-बाग़ क्या जब वो मह-ए-कामिल नहीं
मीर ग़ुलाम हुसैन नाज़ुकी
ना'त-ओ-मनक़बत
विलायत का हुआ ऐ'लाँ ग़दीर-ए-ख़ुम की महफ़िल मेंसजा है मिम्बर-ए-सुल्ताँ ग़दीर-ए-ख़ुम की महफ़िल में
सय्यद हसन अहमद
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
अंदरीं महफ़िल ज़े-बस गर्म-ए-बयानम कर्द:अन्दशम्अ' साँ हर ’उज़्व-ए-मन सर्फ़-ए-ज़बानम कर्द:अन्द
ख़्वाजा मीर दर्द
ग़ज़ल
महफ़िल-ए-रिंदाँ में जाम मुल का होना चाहिएज़ोहद का क़ुल हो चुका क़ुलक़ुल का होना चाहिए
ख़्वाजा नासिरुद्दीन चिश्ती
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ग़ज़ल
ये फ़साना रंज-ए-महफ़िल के सिवा कुछ भी नहींया'नी अब ख़ाकिस्तर दिल के सिवा कुछ भी नहीं
अज़मत हुसैन ख़ान
सूफ़ी लेख
ज़िक्र-ए-ख़ैर ख़्वाजा रुकनुद्दीन इश्क़
ख़्वाजा रुकनुद्दीन इश्क़ एक महान सूफ़ी शा’इर हुए हैं। अगर उनकी ज़िंदगी और शाइरी पर नज़र
रय्यान अबुलउलाई
ग़ज़ल
महफ़िल का ये अंदाज़ कहाँ वो हैं कहाँ मैंदुनिया को ख़बर होगी जो खोलूँगा ज़बाँ मैं
पीर नसीरुद्दीन नसीर
ना'त-ओ-मनक़बत
साइम चिश्ती
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
बिया साक़ी कि चर्ख़-ए-दूँ मुकद्दर कर्द महफ़िल-हामगर दस्त-ए-सुबू शोयद ग़ुबार-ए-ख़ातिर-ए-दिल-हा