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शे'र
जिलाया मार कर क़ातिल ने मैं इस क़त्ल के क़ुर्बांहुआ दाख़िल वो ख़ुद मुझ में मैं ऐसे दख़्ल के क़ुर्बां
मर्दान सफ़ी
फ़ारसी कलाम
हेच कारम 'मीर' हस्ब-ए-मुद्द’आ दर ग़म न शुदमुर्दने मर्कूज़-ए-ख़ातिर दाश्तम आँ हम न शुद
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
जिलाया मार कर क़ातिल ने में इस क़त्ल के क़ुर्बांहुआ दाख़िल वो ख़ुद मुझ में मैं ऐसे दख़्ल के क़ुर्बां
मर्दान सफ़ी
शे'र
कोई मर कर तो देखे इम्तिहाँ-गाह-ए-मोहब्बत मेंकि ज़ेर-ए-ख़ंजर-ए-क़ातिल हयात-ए-जावेदाँ तक है
बेदम शाह वारसी
शे'र
मर ही गए जफ़ाओं से क़ातिल तड़प-तड़पमैं क्या कि और कितने ही बिस्मिल तड़प-तड़प
ख़्वाजा रुक्नुद्दीन इश्क़
ग़ज़ल
मर ही गए जफ़ाओं से क़ातिल तड़प-तड़पमैं क्या कि और कितने ही बिस्मिल तड़प-तड़प



