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ग़ज़ल
रूह-ए-रवाँ नग़्मा तुम नग़्मों का सोज़ साज़ मेंजान-ए-ख़याल-ओ-ख़्वाब तुम जान-ए-जहान-ए-नाज़ में
बहज़ाद लखनवी
शे'र
सुरूर-ओ-कैफ़ का नग़्मा ग़म-ओ-अंदोह का नौहातिलिस्म-ए-ज़ीस्त की सरगम कभी कुछ है कभी कुछ है
अब्दुल हादी काविश
कलाम
बहज़ाद लखनवी
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ग़ज़ल
क्या मज़ा देने लगा उस को सुजूद-ए-संग-ए-दरक्यूँ जबीन-ए-वक़्फ़-ए-बुत-ए-बुत-ख़ाना बन कर रह गई
बहज़ाद लखनवी
ग़ज़ल
अब वो कहाँ है नाज़-ए-हुस्न अब है कहाँ नियाज़-ए-'इश्क़कौन बहाए अश्क-ए-ग़म देख के मुस्कुराए कौन
बहज़ाद लखनवी
ग़ज़ल
मज़ा देने लगी है शम’-ओ-परवाना की बेचैनीये दुनिया वाक़िफ़-ए-असरार-ए-महफ़िल होती जाती है
बहज़ाद लखनवी
शे'र
जहाँ हैं महव-ए-नग़्मा बुलबुलें गुल जिस में ख़ंदाँ हैंउसी गुलशन में कल ज़ाग़-ओ-ज़ग़न का आशियाँ होगा