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शे'र
उठ के अँधेरी रातों में हम तुझ को पुकारा करते हैंहर चीज़ से नफ़रत हम को हुई हम जन्नत-ए-फ़र्दा भूल गए
अब्दुल हादी काविश
शे'र
उठ के अँधेरी रातों में हम तुझ को पुकारा करते हैंहर चीज़ से नफ़रत हम को हुई हम जन्नत-ए-फ़र्दा भूल गए
अब्दुल हादी काविश
ग़ज़ल
कहो बालीं से उठ जाए तबीब-ए-दुश्मन-ए-जाँ कोविसाल यार काफ़ी है हमारे दर्द-ए-हिज्राँ को
अब्दुल रहीम कुंजपूरी
पद
विरह के पद - राम मिलन रो घणो उमावो, नित उठ जोऊँ बाटड़ियाँ
राम मिलन रो घणो उमावो, नित उठ जोऊँ बाटड़ियाँदरस बिना मोहि कछु न सुहावै, जक न पड़त है आँखड़ियाँ
मीराबाई
ग़ज़ल
फ़ना बुलंदशहरी
सूफ़ी उद्धरण
जिस काम में स्वार्थ आ जाए, उस से बरकत उठ जाती है।
जिस काम में स्वार्थ आ जाए, उस से बरकत उठ जाती है।
दाता साहिब
कलाम
तुम्हारी अंजुमन से उठ के दीवाने कहाँ जातेजो वाबस्ता हुए तुम से वो अफ़्साने कहाँ जाते