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साखी
घट अकास के मध्द में पंछी परम अकास
घट अकास के मध्द में पंछी परम अकाससमुँद सिखर सूरत चढ़ी पावे 'तुलसी-दास'
तुलसी साहिब हाथरस वाले
पद
चेतावनी का अंग - धन संचै तो सील का दूजा परम सँतोख
धन संचै तो सील का दूजा परम सँतोखज्ञान रतन भाजन भरो असल खजाना रोक
गरीब दास
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पद
गुन अजब नामः - रहसि जब एक रंग जासूँ पिरम तब खोलिये तासौं
रहसि जब एक रंग जासूँ पिरम तब खोलिये तासौंअजहुँ तौं तरल बुधि नारी न बूझसि प्रकति पीय प्यारी
वाजिद जी दादूपंथी
शबद
ये जन्म निछावर हो जाये भगवान का प्रेम निभाने में
ये कान सदा ही लगे रहे हरि कथा परम रस पाने मेंये आँख सदा हरि-रूप पवें सब बालक वृध्द युवाने में
स्वामी आत्मप्रकाश
साखी
प्रेम का अंग - प्रेम प्रेम सब कोइ कहै प्रेम न चीन्है कोय
प्रेम प्रेम सब कोइ कहै प्रेम न चीन्है कोयआठ पहर भीना रहै प्रेम कहावै सोय
कबीर
पद
तिंविर साँझ का गहिरा आवै छावै प्रेम मन-तन में
तिंविर साँझ का गहिरा आवै छावै प्रेम मन-तन मेंपच्छिम दिस कि खिड़की खोलो डूबहु प्रेम-गगन में
कबीर
पद
मुरली बजत अखंड सदाये तहाँ प्रेम झनकारा है
मुरली बजत अखंड सदाये तहाँ प्रेम झनकारा हैप्रेम-हई तजी जब भाई सत्त लोक की हद पुनी आई
कबीर
साखी
प्रेम का अंग - जा घट प्रेम न संचरै सो घट जानु समान
जा घट प्रेम न संचरै सो घट जानु समानजैसे खाल लोहार की साँस लेत बिन प्रान
कबीर
साखी
प्रेम का अंग - पीया जाहै प्रेम रस राखा चाहै मान
पीया जाहै प्रेम रस राखा चाहै मानएक म्यान में दो खड़ग देखा सुना न कान
कबीर
दोहा
रहिमन मारग प्रेम को मत मतिहीन मझाव
रहिमन मारग प्रेम को मत मतिहीन मझावजो डिगिहै तो फिर कहूँ नहिं धरने को पाँव
रहीम
अरिल्ल
अरिल छंद - राम भजहु लब लाइ प्रेम पद पाइया
राम भजहु लब लाइ प्रेम पद पाइयासफल मनोरथ होय सत्त गुन गाइया
गुलाल साहब
साखी
प्रेम का अंग - जहाँ प्रेम तहँ नेम नहि तहाँ न बुधि ब्यौहार
जहाँ प्रेम तहँ नेम नहि तहाँ न बुधि ब्यौहारप्रेम मगन जब मन भया तब कौन गिनै तिथि बार
कबीर
गूजरी सूफ़ी काव्य
'बाजन' हलवा प्रेम जेहे चाउं खाइया।
'बाजन' हलवा प्रेम जेहे चाऊँ खाइयाउस तो कुछ न भावे जीव नशा सूँ लाइया
शैख़ बहाउद्दीन बाजन
सवैया
प्रेम-वेदना - प्रेम मरोरि उठै तब ही मन पाग मरोरनि मे उरझावै
प्रेम मरोरि उठै तब ही मन पाग मरोरनि मे उरझावैरूसे से ह्वै दृग मोसो रहै लखि मोहन मूरति मो पै न आवै
