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पद
चेतावनी -घट भीतर तू जाग री, है सुरत पुरानी ।
घट भीतर तू जाग री, है सुरत पुरानी ।बिना देश झांकत रही, सब मर्म भुलानी।।
शिवदयाल सिंह
साखी
मोटे जब लग जायं नहिं, झीने कैसे जाय।
मोटे जब लग जायं नहिं, झीने कैसे जाय।ताते सबको चाहिये, नित गुरु भक्ति कमाय।।
शिवदयाल सिंह
पद
अनाहत नाद -मुरलिया बाज रही कोइ सुने संत धर ध्यान।।
मुरलिया बाज रही कोइ सुने संत धर ध्यान।।सो मुरली गुरु मोहिं सुनाई लगे प्रेम के बान।।
शिवदयाल सिंह
पद
सुरत की साधना -सुर्त पनिहारी सतगुरु प्यारी चाल गगन के कूप।।
सुर्त पनिहारी सतगुरु प्यारी चली गगन के कूप।।प्रेम डोर ले पनघट आई भरी गगरिया खूब ।।
शिवदयाल सिंह
साखी
गुप्त रूप जहां धारिया, राधास्वामी नाम।
गुप्त रूप जहां धारिया, राधास्वामी नाम।बिना मेहर नहिं पावई, जहां कोई बिसराम।।
शिवदयाल सिंह
पद
साधना-परिचय -घर आग लगावे सखी, सोइ सीतल समुंद समावे।।
घर आग लगावे सखी, सोइ सीतल समुंद समावे।।जड़ चेतन की गांठ खुलानी, बुन्दा सिन्ध मिलावे।।



